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अलवर किसान आंदोलन और शेखावाटी में किसान आन्दोलन

अलवर किसान आन्दोलन
यहाँ भू-राजस्व ठेका प्रणाली पर सौंपा हुआ जाता था, जिसे इजारा कहा जाता है | इसके तहत उची बोली लगाने वालो को भूमि  अवधि के लिए दे दी जाती थी।
14 मई, 1925 ई. को अलवर के निमुचणा गाव में  किसानों की सभा पर अंधाधुंध फायरिंग की गई। इसमें लगभग 156 किसान मारे गये।

गांधीजी ने नीमच को जलियावाला बाग हत्याकाण्ड बढ़कर बताया। इस आन्दोलन में अधिकांश किसान राजपूत थे। नवम्बर, 1925 में सरकार ने किसानों की माँगे मान ली और आंदोलन समाप्त हो गया।
अलवर में किसानों की फसलों को सूअरों द्वारा नुकसान पहुँचाने पर भी उन्हें मारने पर प्रतिबंध था। इसके विरोध में 1921 ई. में मेव किसानों द्वारा आंदोलन करने पर सूअर मारने की अनुमति मिल गई।
मेव किसानों ने बढी हई लगान देने से मना करते हुए 1932 ई. में आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। इसका नेतृत्व मोहम्मद अली और यासीन खाँ ने किया।

शेखावाटी में किसान आन्दोलन

शेखावाटी में किसान आन्दोलन

 शेखावाटी आन्दोलन के मुख्य कार्यकर्ता रामनारायण चौधरी, ठाकुर देशराज, मास्टर चन्द्रभान, चौधरी हरिसिंह, हरलालसिंह खर्रा, किशोरी " देवी, उत्तमा देवी आदि थे।
1931 ई. में राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा की स्थापना की गई। इसके तत्त्वावधान में 1933 ई. में पलथाना में जाट सम्मेलन आयोजित कर बढ़ी हुई लगान का विरोध किया।
शेखावाटी में कटराथल गाँव में 25 अप्रैल, 1934 ई. को किशोरी देवी (हरलालसिंह खर्रा की पत्नी) के नेतृत्व में लगभग 10,000 जाट महिलाओं ने किसान आंदोलन में भाग लिया। इसमें उत्तमा देवी मुख्य वक्ता थी।
खुड़ी हत्याकाण्ड-1935 ई. में धरने पर बैठे किसानों पर कैप्टन वैब ने लाठियाँ चलवाई, जिसमें 4 किसान मारे गये और 100 घायल हुए।
कूदण हत्याकाण्ड-सीकर के कूदण गाँव में कैप्टन वैब ने गोलियाँ चलाई, जिसमें तीन लोग मारे गये। इसके विरोध में 26 मई, 1935 को सीकर दिवस मनाया गया।

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