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मानव तंत्र

मानव तंत्र 

  1. पाचन तंत्र 
  2. श्वसन तंत्र 
  3. परिसंचरण तंत्र 
  4. उत्सर्जन तंत्र 
  5. जनन तंत्र 
  6. तंत्रिका तंत्र 




मानव तंत्र
मानव तंत्र

1.पाचन तंत्र – 

पोषण – वह प्रक्रिया जिसमे भोज्य पदार्थ में उपस्थित पोषक पदार्थ को ग्रहण किया जाता है | पोषण कहलाता है |

पोषण के आधार पर जीवो को प्रमुख दो भागो में बांटा गया है –

(A) स्वपोषी पोषण – पोषण की वह विधि जिसमे जीव अपना भोजन स्वयं संश्लेषित करता है | स्वपोषी कहलाता है | उदा. – हरे पेड़ पौधे , नील हरित शैवाल इत्यादि |

( B ) विषमपोषी पोषण – पोषण की वह विधि जिसमे जीव अपने भोजन के लिए दुसरो पर निर्भर होते है | विषम पोषी कहलाते है |

उदा. – मानव इत्यादि |

पाचन – भोजन में उपस्थित जटिल पोषक पदार्थो व बड़े अणुओ को विभिन्न रासायनिक क्रियाओ तथा एन्जाइमो की सहायता से सरल पदार्थो में परिवर्तित करना पाचन कहलाता है |

मानव पाचन तंत्र – मानव पाचन तंत्र निम्नलिखित दो भागो से  मिलकर बना है

(1) आहारनाल (2) पाचक ग्रंथिया

(1) आहारनाल – आहारनाल एक लम्बी नालिका आकार संरचना होती है जो मुख से शुरू होकर मलद्वार तक जाती है |इसकी लम्बाई लगभग 8 से 10 मी. तक होती है | आहारनाल में मुख्य निम्नलिखित अंग पाए जाते है |



( A ) मुख – यह कटोरे नुमा अंग है | मुख द्वारा भोजन का अन्तर्ग्रहण किया जाता है | मुख में दो मान्शल होटो से घिरा होता है | जो भोजन को पकड़ने में सहायता  करता है | मुख में दो संरचनाए पाई जाती है जिन्हें दाँत व जीभ कहते है |

(B) जीभ – जीभ एक मासल संरचना होती है | इसका आगे का भाग स्वतंत्र होता है व पिछला भाग लटका हुवा होता है | जीभ बोलने में सहायता करता है | व भोजन को लसलसा बनाती है |

(2) ग्रसनी – यह एक लम्बी नलिका आकार संरचना होती है | ग्रसनी से होकर भोजन आहारनाल में चला जाता है तथा वायु श्वासनाल में चली जाती है |

(3) ग्रासनाल (ग्रसिका) –  यह एक संकरी पेशिया नलिका होती है जिसकी लम्बाई लगभग 25 cm होती है | ग्रासनाल में पाचन की कोई क्रिया संपन्न नहीं होती है | यहा से होता हुआ भोजन अमाशय में पहुच जाता है  |

(4) अमाशय – यह अंग्रेजी के अक्षर J के आकार का होता है | यह ग्रासनली व ग्रहणी के मध्य गुहा के बांये भाग में स्थित होती है | आमाशय को तीन भागो में बांटा गया है  जिनहे कार्डियक, फडीस व जठरनिर्गमि भाग होता है |

(5) छोटी आंत – छोटी आंत एक कुंडलित संरचना होती है |जिसकी औसतम लम्बाई 7 m होती है | इस भाग के द्वारा भोजन का सर्वाधिक पाचन व अवशोषण होता है |इसे तीन भागो में बांटा गया है |

(A) ग्रहणी- यह छोटी आंत का सबसे छोटा भाग होता है जो भोजन का रासायनिक पाचन करता है |

(B)अग्रशुद्रांश – यह छोटी आंत का मध्य भाग है इसके द्वारा भोजन का अवशोषण होता है |

(c) क्षुद्रांत – यह छोटी आंत का अंतिम भाग है इसके द्वारा पित्त लवण व विटामिनो का अवशोषण किया जात है |

(6) बड़ी आंत – बड़ी आंत का मुख्य कार्य जल व खनिज लवणों का अवशोषण तथा अपचित भोजन को मलद्वार द्वारा उत्सर्जित करता है | इसे तीन भागो में बांटा गया है |

(1) अंधनाल (सीकम )   (2) वृहदान्त्र (कोलोन )      (3) मलाशय ( रेक्टम )

पाचक ग्रंथिया – मानव पाचन तंत्र में निम्नलिखित पाचक ग्रंथिय पाई जाती है –

(1) लार ग्रन्थि – यह ग्रन्थि जीभ में पाई जाती है | इसके द्वरा लार स्त्रावित होती है | जो भोजन को लसलसा बना देती है | लार रस में ४८६५५५६५ नामक एन्जाइम पाया जाता है जो भोजन में उपस्थित स्टार्च का मुख में पाचन सुरु कर देती है |

(2) जठर ग्रन्थि – यह ग्रन्थि आमाशय में पाई जाती है | इससे जठर रस स्त्रावित होता है जो की अम्लीय प्रक्रति का होता है | जठर रस का pH मान 1.2 से 2 तक होता है | जठर रस में तीन प्रमुख पदार्थ आये जाते है |


1.हैड्रोक्लोरिक अम्ल

कार्य :-(A)भोजन को अम्लीय माध्यम प्रदान करता है |

(b) भोजन के साथ आये हुए जीवाणुओं को नष्ट करता है |

(c) भोजन को सड़ने से बचाता है |

2. श्लेष्मा

कार्य :- यह अमाशय को अत्यधिक हैड्रोक्लोरिक अम्ल के प्रभाव से बचाता है |

3. यक्रत:- यह ग्रंथि छोटी आंत में पाई जाती है यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि होती है, इस ग्रंथि से पित रस स्त्रावित होता है |पित रश की प्रक्रति क्षारीय होती है | पित रस अमास्य में बनने वाले अम्ल के प्रभाव को कम करता है तथा वसा के बड़े – बड़े कणों को छोटी-छोटी गोलिकाओ में तोड़ता है |

4. अग्नाशय ग्रन्थि :- यह ग्रन्थि छोटी आंत में पाई जाती है | इसे मिश्रित ग्रन्थि भी कहते है अग्नाशय ग्रन्थि से अग्नाशयी रस स्त्रावित होता है यह क्षारीय प्रक्रति का होता है इसे पूर्ण पाचक रस भी कहते है | इसमें तीन एन्जाइम पाए जाते है

  1. एमाइलेस
  2. लाइपेज
  3. ट्रिप्सिन एंजाइम




1.एमाइलेस :- यह मालटोज को ग्लूकोज में बदलता है |

2.लाइपेज :- यह वसा को वसीय अम्ल एवं गिल्सरोल में तोड़ देता है |

३.ट्रिप्सिन एंजाइम :- यह प्रोटीन का पूर्ण पाचन कर उसे अमीनों अम्ल में तोड़ देता है |

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पाचन की क्रियाविधि – भोजन के पाचन की क्रिया कई यांत्रिक एवम् रासायनिक प्रक्रियाओ द्वारा सम्पन्न होती है | सर्वप्रथम मुख के द्वारा भोजन का अन्तर्ग्रहण किया जाता है | मुख में उपस्थित दांतों के सहायता से भोजन को चबाया जाता है | जीभ में उपस्थित लार रस द्वारा भोजन को लसलसा बनाया जाता है | तब भोजन को क्रमाकुंचन विधि से ग्रसनी से ग्रसिका तक तथा ग्रसिका से आमाशय में पहुच जाता है | आमाशय में तीन प्रकार के स्त्राव पाए  जाते है जिन्हें क्रमशः HCl अम्ल ,  श्लेष्मा व पेप्सिन एंजाइम  कहते है | आमाशय में भोजन का पाचन लगभग  तीन घंटो तक होता है | आमाशय से भोजन छोटी आंत में विभिन्न नलिकाओ द्वारा अग्नाशय रस , पित्त रस व  आंत्र रस छोड़े जाते है जो भोजन में उपस्थित विभिन्न पोषक तत्वों का पाचन करते है |  छोटी आंत से अपचित भोजन बड़ी आंत में जाता है | बड़ी आंत  द्वारा अपचित भोजन में   से जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर लिया  जाता है | शेष बचा ठोस भाग मलद्वार द्वारा बाहर त्याग दिया  जाता है |   इस प्रकार भोजन के पाचन की क्रिया संपन्न होती है |

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