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भारत में प्राकृतिक वनस्पति | Natural Vegetation In India

प्राकृतिक वनस्पति Natural vegetation

प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति से तात्पर्य उन पौधों से है जो मानव की सहायता के बिना स्वयंमेव वन्य अथवा प्राकृतिक अवस्था में उगते हैं। इसे अधिक स्पष्ट करें तो कहा जा सकता है कि विभिन्न पर्यावरणीय तथा पारितंत्रीय परिवेश में जो कुछ भी प्राकृतिक रूप में उगता है, उसे प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।

प्राकृतिक वनस्पति के विकास में विभिन्न कारकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इन कारकों का विवरण निम्नानुसार है-

1. तापमान: एक पौधे को अपने विकास के लिए कम से कम 6 डिग्री सेल्सियस मासिक औसत तापमान की आवश्यकता होती है। इससे कम तापमान पर पौधे नहीं पनप सकते। इसी तरह उच्च तापमान से भी पौधे मुरझा सकते हैं। तापमान की भिन्नता वनस्पतियों के आकार-प्रकार में भी परिवर्तन का कारण बनती है। इसका स्पष्ट उदाहरण अरुणाचल प्रदेश व असोम की वनस्पतियों में स्वरूपगत भिन्नता है। अरुणाचल प्रदेश व असोम दोनों राज्यों में वर्षा की मात्रा उच्च रहती है किंतु अरुणाचल प्रदेश में निम्न तापमान रहने के कारण वहां की वनस्पति के आकार-प्रकार में अंतर है।

2. वर्षा: यह वनस्पतियों के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक है। विभिन्न पौधों हेतु वर्षा की मात्रा की भिन्न-भिन्न आवश्यकता होती है।

3. मिट्टी: मिट्टी के प्रकार व उसकी अपनी पृथक् विशेषता का भी वनस्पति पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। भारत में बांगर मिट्टी के क्षेत्रों की वनस्पति, खादर मिट्टी के क्षेत्रों की वनस्पति से भिन्न होती है। इसी प्रकार रेतीली मिट्टी में अलग प्रकार की वनस्पति उत्पादित होती है।

4. धरातलीय स्वरूप: धरातलीय स्वरूप भी वनस्पतियों को प्रभावित करता है। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा की मात्रा का वनस्पति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। यहां ऊंचाई तथा तापमान ने वनस्पति प्रदेश निर्धारित किए हैं। जलवायु और धरातलीय स्वरूप में अंतर होने के कारण ही भारत में उष्ण और शीतोष्णकटिबंधीय दोनों ही प्रकार की वनस्पति मिलती है।

5. सूर्य का प्रकाश: सूर्य का प्रकाश पौधों की वृद्धि में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया हेतु यह आवश्यक है।




भारत में प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति से अभिप्राय भौतिक दशाओं अथवा परिस्थितियों में स्वतः उगने वाली वनस्पति से है, जिसमें पेड़-पौधे, झाड़ियां, घास, आदि शामिल होते हैं। भारत की वनस्पति का आकलन करने से पहले वनस्पति जात (फ्लोरा), वनस्पति तथा वन में विभेद स्पष्ट करना आवश्यक होगा। वनस्पति जात (फ्लोरा) का आशय किसी प्रदेश तथा काल विशेष में पाये जाने वाले, सभी जातियों सहित पेड़-पौधों, झाड़ियों के समूह से है। इस दृष्टि से भारत को पूर्ण रूप से उष्णकटिबंधीय वर्ग में रखा गया है। वनस्पति एक पर्यावरणीय या पारिस्थितिक तंत्र में आपसी सहयोग के साथ रह रही पौधों की विभिन्न प्रजातियों के एकत्रण को व्यक्त करती है। अंत में, वन शब्द प्रायः प्रशासकों एवं सामान्य जनता द्वारा प्रयुक्त किया जाता है तथा पेड़ों एवं झाड़ियों से घिरे एक विस्तृत क्षेत्र का सूचक है।

भारतीय पौधों की उत्पत्ति

हिमालय एवं प्रायद्वीपीय भागों का अधिकांश क्षेत्र घरेलू या आंतरिक पेड़-पौध प्रजातियों से आवृत्त है, जबकि सिंधु-गंगा मैदान एवं थार मरुस्थल में सामान्यतः बाहरी या विदेशी पौध प्रजातियां पायी जाती हैं। भारत में पाये जाने वाली पोध प्रजातियों का 40 प्रतिशत विदेशी हैं। ये विदेशी पौधे विश्व के विभिन्न स्थानों से भारत में पहुंचे हैं। बोरियल कहे जाने वाले पौधे चीनी-तिब्बती क्षेत्र से तथा पुरा उष्णकटिबंधीय पौधे पड़ोसी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से आये हैं। थार मरुस्थल एवं गंगा के मैदान के पश्चिमी सीमांत में पाया जाने वाला शुष्क एवं अर्ध शुष्क वनस्पति आवरण उत्तरी अफ्रीका के क्षेत्रों की पौध प्रजातियों से प्रभावित है। भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित पहाड़ियों पर इंडो-मलेशियाई मूल की वनस्पतियों का आवरण पाया जाता है।

प्राकृतिक वनस्पति का वर्गीकरण

भारतीय वनस्पति उष्णकटिबंधीय और शीतोष्णकटिबंधीय दोनों प्रकार की है। शीतोष्णकटिबंधीय वनस्पति हिमालय की ऊंचाइयों पर मिलती है। उष्णकटिबंधीय वनस्पति हिमालय के निम्नवर्ती क्षेत्र तथा शेष भारत में मिलती है। एच.वी. चैम्पियन, स्वीइन पर्थ, कार्ल ट्राज तथा जी.एस.पुरी के वानस्पतिक अध्ययनों के आधार पर (जलवायु, उच्चता तथा वर्षा के आधार पर) भारतीय वनस्पति को मुख्यतया 6 भागों में वर्गीकृत किया गया है-

1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतया पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले पश्चिमी क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में मिलती है। इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है और यहां आर्द्रता की मात्रा 77 प्रतिशत के लगभग होती है। इस क्षेत्र का वार्षिक औसत तापमान 22°C सेंटीग्रेड से लेकर 22°C तक रहता है। यह क्षेत्र उत्तर में क्रमशः हिमालय की तराई, पूर्वी हिमालय के उप-प्रदेश और दक्षिण में पश्चिमी घाट के ढाल पर महाराष्ट्र से लेकर नीलगिरी, अन्नामलाई व इलायची की पहाड़ियों, कर्नाटक, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप तक फैला हुआ है। पश्चिमी घाट में सदाबहार वनस्पति के क्षेत्र 450 मीटर से 1500 मीटर की ऊंचाई तक तथा शिलांग पठार (असम) में 1000 मीटर की ऊंचाई तक मिलते हैं। ये वनस्पतियां उच्च तापमान, 300 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा तथा अपेक्षाकृत अल्पकालीन शुष्क ऋतु के कारण अत्यंत सघन होती है और इस क्षेत्र के वृक्षों की ऊंचाई 60 मीटर से भी अधिक होती है। वृक्षों के ऊपरी सिरे शाखाओं से इस प्रकार आच्छादित होते हैं कि वे छातों का आकार ग्रहण कर लेते हैं। सदाबहार वनस्पति क्षेत्र में महोगनी, आबनूस, जारूल, बांस, बेंत, सिनकोना और रबड़ के वृक्ष मुख्यतया मिलते हैं।

सदाबहार क्षेत्र मसालों के बागानों के महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मसालों के उत्पादन के लिए उसकी दोनों आधारभूत आवश्यकताओं- प्रवाहमान जल और पत्तों वाली खाद की पूर्ति प्राकृतिक रूप से ही हो जाती है। बांस मुख्यतया नदियों के किनारे मिलते हैं। रबड़ तथा सिनकोना दक्षिणी सह्याद्री और अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में मिलते हैं। अण्डमान-निकोबार का 95 प्रतिशत भाग सदाबहार वनस्पति से परिपूरित है। यहां आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्ष-पादोक, धूप, चूई, श्वेत चुगलम, गुर्जन आदि भी बहुतायत में मिलते हैं। सदाबहार वनों को दो उप-भागों में विभक्त किया जाता है- पूर्ण सदाबहार वन (300 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले) तथा अर्द्ध-सदाबहार वन (250 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्र)।



2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतया पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल, प्रायद्वीप के उत्तरी-पूर्वी पठारों, उत्तर में शिवालिक श्रेणी के भाबर और तराई क्षेत्र में मिलती है, किन्तु इसका विस्तार भारत के उन समस्त भागों में है, जहां औसतन 100 सेंटीमीटर से लेकर 200 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है। इस वनस्पति को मानसूनी वनस्पति की भी संज्ञा दी जाती है। इस क्षेत्र के अंतर्गत सागवान, सखुआ या साल, शीशम, चंदन, आम, त्रिफला, खैर, महुआ आदि आर्थिक महत्व के वृक्षों के साथ-साथ बांस भी पाया जाता है। यहां की वनस्पतियां सदाबहार वनस्पतियों की भांति न तो सघन होती हैं और न ही ज्यादा ऊंचाई वाली। ग्रीष्म ऋतु में इन वृक्षों के पर्ण-त्याग (पत्तों के गिराने) के कारण ही इन्हें पर्णपाती वनस्पति की भी संज्ञा दी जाती है। सागवान, सखुआ और शीशम की लकड़ी कड़ी तथा मजबूत होती है और फर्नीचर के लिए तो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। भारत में सागवान के वन 90 लाख हेक्टेयर भूमि में तथा सखुआ या साल के वन 116 लाख हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत हैं। महाराष्ट्र और पश्चिमी मध्य प्रदेश सागवान के वृक्षों के लिए तथा पूर्वी मध्य प्रदेश, छोटानागपुर, शिवालिक, भाबर तथा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम सखुआ के वृक्षों के लिए विख्यात हैं। शीशम के वृक्ष मुख्यतया हिमालय की तराई में मिलते हैं। चन्दन के वृक्ष अधिकांशतया कर्नाटक (प्राचीन मैसूर) में मिलते हैं। त्रिफला, महुआ और बांस जहां-तहां मिल जाते हैं। त्रिफला औषधि निर्माण में काम आता है, जबकि महुआ से तेल के साथ-साथ मादक पेय का भी निर्माण किया जाता है। ध्यातव्य है कि आंवला, हरड़ और बहेड़ा को संयुक्त रूप से त्रिफला की संज्ञा दी जाती है। ये वन देश के लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र पर फैले हुए हैं।

3. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतः उत्तर प्रदेश, विहार (पश्चिमी), मध्य प्रदेश (पश्चिमोत्तर), महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश (उत्तरी), कर्नाटक और तमिलनाडु (पूर्वी) में प्राप्त होती है। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा औसतन 70 सेंटीमीटर से लेकर 100 सेंटीमीटर तक होती है। इस प्रकार की वनस्पति में न्यूनता आयी है, क्योंकि जिन क्षेत्रों में यह वनस्पति मिलती है, वहां जनसँख्या को बसने तथा कृषि कार्य के लिए वनों की असीमित कटाई हुई है। वर्षा की अपेक्षाकृत कमी और जलवायु की विषमता के कारण इस प्रकार की वनस्पतियां कम ऊंचाई वाली होती हैं। इस क्षेत्र में वृक्ष सघन न होकर विरल हैं। इन क्षेत्रों में पाए जाने वाले अधिकांश वृक्ष निम्न कोटि के होते हैं। शुष्क ऋतु के आगमन पर वृक्षों के पते गिरने लगते हैं और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वृक्ष सुख रहे हों। शुष्कता की सीमा जब समाप्त होती है, तब पर्णपाती वनस्पति कटीली वनस्पतियों और झाड़ियों में बदल जाती हैं।

4. पर्वतीय वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतया प्रायद्वीपीय पठार के उच्चवर्ती क्षेत्रों में- नीलगिरि, अन्नामलाई, पलनी, महाबलेश्वर, सह्याद्रि के उच्च भाग, सतपुड़ा आदि में मिलती है। इन क्षेत्रों में फर्न और काई बहुतायत में मिलते हैं, जबकि हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में यूकेलिप्ट्स के वृक्ष लगाए गए हैं। नीलगिरि में उटकमंड के वन अत्यधिक मात्रा में नष्ट किए जा चुके हैं। वनों के विनाश के कारण इस क्षेत्र में जलापूर्ति का संकट भी उपस्थित हो गया है। ठीक इसके विपरीत, जब हिमालय पर्वतीय क्षेत्र की ओर बढ़ते हैं, तब हमें सघन वनस्पति मिलती है। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में उच्चता के अनुरूप उष्णकटिबंधीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक पायी जाती है। निम्नवर्ती क्षेत्रों में (1500 मीटर के नीचे) पूर्णतया पर्णपाती वन मिलते हैं, किन्तु 1500 मीटर की ऊंचाई के बाद दो प्रकार की वनस्पतियां मिलती हैं-कोणधारी सदाबहार वनस्पति और अल्पाइन वनस्पति।

कोणधारी सदाबहार वनस्पति हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में 1500 मीटर से लेकर 3500 मीटर की ऊंचाई पर मिलती हैं। इस प्रकार की वनस्पति लगभग 42 लाख हेक्टेयर भूमि में फैली है। इस क्षेत्र में मुख्यतया देवदार के वन विकसित हैं। इन वनस्पतियों की लकड़ियां अपेक्षाकृत मुलायम और पत्तियां छोटी तथा सूई की आकृति की होती हैं। यहां देवदार के अतिरिक्त सनोवर (स्प्रूस), श्वेत सनोवर (सिल्वर फर) और चीड़ के वृक्ष भी बहुतायत में मिलते हैं। आर्थिक दृष्टि से ये वृक्ष बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हिमालय के पूर्वी भाग में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है और इस क्षेत्र में चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं, यथा-बलूत (ओक), मैगनेलिया और लारेल। इस प्रकार की वनस्पति मुख्यतया असोम में देखने को मिलती है।

अल्पाइन वनस्पति हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में 2800 मीटर से लेकर 3700 मीटर की ऊंचाई तक मिलती है। इस क्षेत्र में इस वनस्पति को मर्ग कहा जाता है, क्योंकि अल्पाइन वनस्पति एक विस्तृत चारागाह की भांति प्रतीत होती है। 3600 मीटर की ऊंचाई तक सामान्यतः छोटे वृक्ष और झाड़ियां मिलती हैं, यथा-बर्च और जुनिपर, जबकि 3600 मीटर से लेकर 4800 मीटर की ऊंचाई तक झाड़ियां और काई ही मिलती हैं। 4800 मीटर के ऊपर जाने पर वनस्पतियां समाप्त हो जाती हैं। अल्पाइन प्रकार की वनस्पतियों में चिनार और अखरोट के वृक्ष आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

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उच्चता के आधार पर पर्वतीय भाग की वनस्पतियों का वर्गीकरण
पर्वतीय क्षेत्र उष्णकटिबंधीय से लेकर टुण्ड्रा प्रकार की वनस्पतियों का विस्तृत विकास प्रदर्शित करते है।
शिवालिक श्रेणी उष्णकटिबंधीय आर्द्र पतझड़ वनस्पतियों से आच्छादित है, यथा-साल और बांस। शिवालिक श्रेणी में समुद्र तल से 1,000 और 2,000 मीटर की ऊंचाई पर नम पर्वतीय वन मिलते हैं, जिनमें ओक, चेस्टनट (अखरोट) एवं अन्य फलीय वृक्ष तथा चीड़ के वन मिलते हैं।
समुद्रतल से 1,600 मीटर से 3,300 मीटर की ऊंचाई तक मिलने वाली मुख्य वनस्पतियां हैं- पाइन, देवदार, सिल्वर फर और स्प्रूस। इन्हें चौड़ी पत्तीवाले वन कहा जाता है।
समुद्रतल से 3,600 मीटर की ऊंचाई के ऊपर अल्पाइन वन शुरू हो जाते हैं। अल्पाइन वनस्पति के अंतर्गत सिल्वर फर, पाइन, बिर्च आदि के वृक्ष प्राप्त होते हैं। अल्पाइन वन, अल्पाइन घास क्षेत्र और झाड़ियों के लिए अनुकूल दशा प्रदान करते हैं।
4,800 मीटर की ऊंचाई तक टुण्ड्रा वनस्पति के रूप में झाड़ियां और काइयां मिलती हैं, जबकि उसके ऊपर वनस्पतियां नहीं मिलतीं।





5. कंटीली वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतया गुजरात से लेकर राजस्थान और पंजाब में मिलती है। इन राज्यों के जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा औसतन 70 सेंटीमीटर से भी कम होती है, वहां कटीली वनस्पतियां मिलती हैं। इन क्षेत्रों में पायी जाने वाली वनस्पतियों में बबूल और खजूर के वृक्ष प्रमुख हैं। प्रायद्वीपीय पठार के मध्य भाग में भी उन क्षेत्रों में जहां दीर्घावधिक शुष्क  ग्रीष्मऋतु रहती है, कटीली वनस्पति मिलती है। ऐसे क्षेत्र मध्य प्रदेश से लेकर आंध्र प्रदेश तक विस्तृत हैं। इस प्रकार की वनस्पतियों में वृक्षों की अधिकतम ऊंचाई 3 मीटर तक होती है। इस प्रकार की वनस्पतियों की जड़ें लम्बी होती हैं और वृक्षों तथा झाड़ियों में लम्बे-लम्बे कांटे होते हैं । नागफनी और कैक्टस प्रजातियों की अर्द्ध-मरुस्थलीय वनस्पति अत्यल्प वर्षा वाले क्षेत्र में पाई जाती है। पश्चिमी राजस्थान में तो लगभग आधा मीटर की ऊंचाई वाली कटीली झाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता। ऐसी संभावना प्रकट की जा रही है कि कुछ काल के बाद इस क्षेत्र में वनस्पतियां रहेंगी ही नहीं, क्योंकि इस क्षेत्र में एक ओर तो वर्षा नहीं होती है और दूसरी ओर ऊंट तथा बकरी यहां की झाड़ियों को अपना आहार बनाती जा रही हैं। राजस्थान का यह क्षेत्र प्रत्येक भारतीय को वनस्पतियों की सुरक्षा के लिए सतर्क होने को आगाह करता है, क्योंकि यहां के जिस क्षेत्र में आज वर्षा नहीं हो रही है और वनस्पतियां समाप्तप्राय हैं, वहीं प्राचीनकाल में अत्यधिक वर्षा होती थी और सघन वनस्पतियां विद्यमान थीं। कालान्तर में वनस्पतियों के दोहन और कटाव के कारण यह क्षेत्र मरुभूमि में बदल गया।

6. ज्वारीय वनस्पति

यह वनस्पति मुख्यतया भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्र में मिलती है। पूर्वी तट के क्षेत्र- गंगा, गोदावरी, कृष्णा आदि के निम्न डेल्टायी भाग में उच्च समुद्री ज्वार का पानी जमा हो जाता है और इस पानी से यहां की भूमि दलदली हो जाती है। बंगाल का सुन्दर वन ज्वारीय वनस्पति का सर्वप्रमुख उदाहरण है। समुद्रतटीय क्षेत्र में मैंग्रोव और सुन्दरी के वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं। ज्वारीय वनस्पति मोटे तौर पर चिरहरित वनस्पति का ही एक भेद प्रतीत होती है। ज्वारीय वनस्पति के अंतर्गत आने वाले वृक्षों की जड़ें रेशेदार और घनी होती हैं और वृक्षों के तने जल से ऊपर उठे होते हैं। इन वृक्षों के बीज जब जल में गिरते हैं, तब शीघ्र ही जड़ का रूप ले लेते हैं और वहां एक नया वृक्ष उत्पन्न हो जाता है। ज्वारीय वनस्पति आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं- इनके द्वारा समुद्री कटाव को रोकने में सहायता मिलती है, इनकी लकड़ियों से काष्ठ कोयले का निर्माण होता है और इस प्रकार की वनस्पतियों से टैनिन और ईधन की लकड़ी भी प्राप्त होती है।

घास क्षेत्र

भारत के घास क्षेत्र की तुलना सवाना या स्टेपी के घास क्षेत्र से नहीं की जा सकती है। भारत के घास क्षेत्र का विस्तार नमी वाली भूमि तथा साल पट्टी में और कुछ-कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में है। भारत के घास क्षेत्र का विभाजन तीन भागों में किया जाता है:

1. निम्न क्षेत्रीय घास: इस प्रकार की घास उन क्षेत्रों में मिलती है, जहां वार्षिक वर्षा 30 सेंटीमीटर से 200 सेंटीमीटर के बीच दर्ज की जाती है और ग्रीष्म ऋतु में तापमान उच्च होता है। इस प्रकार की घास ऊपरी भारत के मैदानी भाग में पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार और उत्तर-पश्चिम असम में प्राप्त होती है। इस प्रकार की घास अनेक प्रकार की मिट्टियों में उत्पन्न होती है और ये क्षेत्र पशुपालन के लिए उपयुक्त हैं।



2. उच्चक्षेत्रीय अथवा पर्वतीय घास: इस प्रकार की घास हिमालय क्षेत्र में 1,000 मीटर की ऊंचाई से ऊपर वाले क्षेत्र में तथा पश्चिमी घाट के वनों से जुड़े कर्नाटक के क्षेत्र में प्राप्त होती है। ये घास दक्षिण भारत के शोला वन में भी मिल जाती है।

3. नदी तटीय घास: इस प्रकार की घास उत्तरी भारत में मिलती है और ये भाबर चारागाह का निर्माण करती हैं, जो भैसों और अन्य पालतू पशुओं के लिए आहार उपलब्ध कराते हैं।

नमभूमि (वेटलैण्ड)

आर्द्र भूमि, पारिस्थितिक तंत्र का जटिल हिस्सा है जिसके अंतर्गत अंतःस्थल, तटीय क्षेत्र एवं समुद्री बांस की एक व्यापक श्रृंखला आती है। इसमें आर्द्र एवं शुष्क दोनों प्रकार के पर्यावरण की विशेषताएं होती हैं एवं अपने उद्गम के आधार पर अत्यधिक विविधता के क्षेत्र होते हैं। रामसर सम्मेलन के अनुसार, नम भूमि क्षेत्र के अंतर्गत दलदली, कच्छ क्षेत्र, जो कृत्रिम या प्राकृतिक, स्थायी या अस्थायी, हो सकते हैं, जिसमें पानी ठहरा हुआ या बहता हुआ हो सकता है। इसमें समुद्री क्षेत्र भी शामिल है जिसकी गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं होती। इस तरह इस परिभाषा में मैंग्रेोव, प्रवाल भिति, एश्चुरी, क्रीक, खाड़ी समुद्री घास भूमि एवं झीलें आ जाती हैं।

रामसर सम्मेलन
भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है जिन्होंने 1972 में ईरान के रामसर शहर अंतरराष्ट्रीय महत्व के नम भूमि क्षेत्रों के बारे में हुए सम्मेलन में तैयार मसौदे पर हस्ताक्षर किया था। साल 2002 में राजस्थान की चिल्का झील को रामसर पुरस्कार भी दिया गया।

रामसर सम्मेलन के तहत भारत में नमभूमि क्षेत्रों की स्थिति-

नम भूमि का नाम राज्य
अष्टमुडी नमभूमि केरल
भितरकणिका ओडीशा
भोज मध्य प्रदेश
चिल्का झील ओडीशा
डीपोर बील असम
पूर्वी कलकत्ता नमभूमि प. बंगाल
हरिके झील पंजाब
कंजली पंजाब
केवलादेव राष्ट्रीय पार्क राजस्थान
कोलेरू झील आंध्र प्रदेश
लोकटक झील मणिपुर
प्वाइंट केलिमियर सेंक्चुरी तमिलनाडु
पोंग डैम झील हिमाचल प्रदेश
रोपड़ पंजाब
सांभर झील राजस्थान
स्पामकोट्टा झील केरल
सोमोरीरी (Tsomoriri) जम्मू एवं कश्मीर
वेम्बनाद-कोल नमभूमि केरल
वुलर झील जम्मू एवं कश्मीर
चंद्रताल हिमाचल प्रदेश
रेणुका हिमाचल प्रदेश
रुद्रसागर त्रिपुरा
अपर गंगा (ब्रजघाट-नरौरा के मध्य) उत्तर प्रदेश
होकरसर (Hokarsar) जम्मू एवं कश्मीर
सुरनीसर-मानसर जम्मू एवं कश्मीर
नलसरोवर गुजरात




रामसर सम्मेलन
भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है जिन्होंने 1972 में ईरान के रामसर शहर अंतरराष्ट्रीय महत्व के नम भूमि क्षेत्रों के बारे में हुए सम्मेलन में तैयार मसौदे पर हस्ताक्षर किया था। साल 2002 में राजस्थान की चिल्का झील को रामसर पुरस्कार भी दिया गया।

रामसर सम्मेलन के तहत भारत में नमभूमि क्षेत्रों की स्थिति-

नम भूमि का नाम राज्य
अष्टमुडी नमभूमि केरल
भितरकणिका ओडीशा
भोज मध्य प्रदेश
चिल्का झील ओडीशा
डीपोर बील असम
पूर्वी कलकत्ता नमभूमि प. बंगाल
हरिके झील पंजाब
कंजली पंजाब
केवलादेव राष्ट्रीय पार्क राजस्थान
कोलेरू झील आंध्र प्रदेश
लोकटक झील मणिपुर
प्वाइंट केलिमियर सेंक्चुरी तमिलनाडु
पोंग डैम झील हिमाचल प्रदेश
रोपड़ पंजाब
सांभर झील राजस्थान
स्पामकोट्टा झील केरल
सोमोरीरी (Tsomoriri) जम्मू एवं कश्मीर
वेम्बनाद-कोल नमभूमि केरल
वुलर झील जम्मू एवं कश्मीर
चंद्रताल हिमाचल प्रदेश
रेणुका हिमाचल प्रदेश
रुद्रसागर त्रिपुरा
अपर गंगा (ब्रजघाट-नरौरा के मध्य) उत्तर प्रदेश
होकरसर (Hokarsar) जम्मू एवं कश्मीर
सुरनीसर-मानसर जम्मू एवं कश्मीर
नलसरोवर गुजरात
कच्छ वनस्पति (मैंग्रोव)
कच्छ वनस्पति, क्षार सहिष्णु प्रजाति है जो तटरेखा पर शैल्टर्ड एस्चुअरी, ज्चारीय नदमुख, पश्च जल क्षेत्र, नमकीन दलदली क्षेत्र में पायी जाती है। कच्छ वनस्पतियों की पारिस्थितिक और आर्थिक महत्ता और विभिन्न मानवीय कार्यकलापों के कारण उनके समक्ष आने वाले खतरों को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय ने 1986 में कच्छ प्रजाति के संरक्षण और प्रबंधन की एक स्कीम शुरू की। कच्छ वनस्पति और प्रवाल भित्ति राष्ट्रीय समिति की सिफारिशों पर सरकार द्वारा देश में 39 कच्छ वनस्पति क्षेत्रों की पहचान की गई है।




भारतीय प्रशांत क्षेत्र अपने प्रवद्धिष्णु मैंग्रोव के लिए जाना जाता है। दुनिया के कुछ उन्नत किस्म के मैंग्रोव गंगा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा नदियों एवं अंडमान निकोबार द्वीप के जलोढ़ डेल्टा में पाए जाते हैं। राज्य वन रिपोर्ट 2009 के अनुसार देश में 4639 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में कच्छ वनस्पतियां हैं जोकि देश के भौगोलिक क्षेत्र का 0.14 प्रतिशत है। कच्छ वनस्पतियों के संरक्षण और उनकी पैदावार बढ़ाने के प्रयासों के बाद से देश में विशेषकर गुजरात, ओडिसा, तमिलनाडु और प. बंगाल में 58 वर्ग किलोमीटर कच्छ वनस्पति क्षेत्र में इजाफा हुआ है। पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में भारत के कुल मैंग्रोव का लगभग आधा हिस्सा पैदा होता है। उसके पश्चात् गुजरात और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह का स्थान आता है। तटीय विनियामक क्षेत्र नोटिफिकेशन 1991, जो कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत है, ने मैंग्रोव को पारिस्थितिकीय रूप से काफी संवेदनशील बताया है और इन्हें CRZ-1 में वर्गीकृत किया है जिससे मैंग्रोव क्षेत्रों का उच्च स्तर पर संरक्षण हो सके। राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 ने यह माना से संरक्षण प्रदान करते हैं तथा सतत पर्यटन का संसाधन आधार होते हैं। इस दिशा में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने ओडीशा में राष्ट्रीय मैंग्रोव आनुवंशिक संसाधन केंद्र की स्थापना की। इसका उद्देश्य तटवर्ती राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को नष्ट हो चुके मैंग्रोव क्षेत्रों के पुनर्वास एवं मैंग्रोव आच्छादित क्षेत्रों में वृद्धि करने हेतु सहायता प्रदान करना है।

भारत सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय समन्वय निकाय की स्थापना की गई है जिसने भविष्य में मैंग्रोव की गतिविधि के लिए चार राज्यों- गुजरात, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश एवं ओडीशा का चयन किया है। फरवरी, 2008 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भारत में मैंग्रीवः जैव-विविधता, संरक्षण एवं पर्यावरणीय सेवाएं विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला इस उद्देश्य से आयोजित की कि अनुसंधान सूचना का वितरण संभव हो तथा शोधकर्ताओं एवं पणधारियों के मध्य संप्रेषण हो सके।

मैंग्रोव वैसे पेड़-पौधों एवं झाड़ियों का समूह है जो तटीय खारे पानी में उगते हैं। यह 25° उत्तर अक्षांशों से 25° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय सागरीय तट पर विकसित होते हैं। यह एश्च्यूरीज, डेल्टा तथा समुद्री तटरेखा के आसपास ज्वारीय क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते हैं। विश्व में वर्तमान में मैंग्रोव की 110 प्रजातियां ज्ञात हैं।
इंडोनेशिया में विश्व के कुल मैंग्रोव वनों का 21 प्रतिशत पाया जाता है जो विश्व में सर्वाधिक है। ब्राजील, आस्ट्रेलिया, मैक्सिको तथा नाइजीरिया में यह विश्व के कुल क्षेत्रफल का क्रमशः9 प्रतिशत, 7 प्रतिशत, 5 प्रतिशत तथा 4.5 प्रतिशत पाया जाता है।
मैंग्रोव वनस्पति विश्व के लगभग 117 क्षेत्रों में लगभग 1,90,000 से 2,40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली है।
विश्व में सर्वाधिक सघन मैंग्रोव वन मलेशिया के तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत के मैंग्रोव वनों में लगभग 1600 वनस्पतियों एवं 3700 जीवों की पहचान की गई है। पश्चिम बंगाल का सुंदर वन क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।
विश्व के कुल मैंग्रोव वनों का पांच प्रतिशत भारत में उपलब्ध है।
भारत में 42 वर्गों और 28 समूहों में मैंग्रोव की 69 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 26 अंडमान और निकोबार क्षेत्र में एवं 18 प्रजातियां पूर्वी तट में पाई जाती हैं।
भारत में मैंग्रोव की दो देशज प्रजातियां हैं, पहली राइजोफोरा एन्नामलायाना जो किपिचवरम तमिलनाडु में और दूसरी ओडीशा के भीतरकनिका क्षेत्र में पाई जाती है।




कच्छ वनस्पति (मैंग्रोव)
कच्छ वनस्पति, क्षार सहिष्णु प्रजाति है जो तटरेखा पर शैल्टर्ड एस्चुअरी, ज्चारीय नदमुख, पश्च जल क्षेत्र, नमकीन दलदली क्षेत्र में पायी जाती है। कच्छ वनस्पतियों की पारिस्थितिक और आर्थिक महत्ता और विभिन्न मानवीय कार्यकलापों के कारण उनके समक्ष आने वाले खतरों को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय ने 1986 में कच्छ प्रजाति के संरक्षण और प्रबंधन की एक स्कीम शुरू की। कच्छ वनस्पति और प्रवाल भित्ति राष्ट्रीय समिति की सिफारिशों पर सरकार द्वारा देश में 39 कच्छ वनस्पति क्षेत्रों की पहचान की गई है।

भारतीय प्रशांत क्षेत्र अपने प्रवद्धिष्णु मैंग्रोव के लिए जाना जाता है। दुनिया के कुछ उन्नत किस्म के मैंग्रोव गंगा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा नदियों एवं अंडमान निकोबार द्वीप के जलोढ़ डेल्टा में पाए जाते हैं। राज्य वन रिपोर्ट 2009 के अनुसार देश में 4639 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में कच्छ वनस्पतियां हैं जोकि देश के भौगोलिक क्षेत्र का 0.14 प्रतिशत है। कच्छ वनस्पतियों के संरक्षण और उनकी पैदावार बढ़ाने के प्रयासों के बाद से देश में विशेषकर गुजरात, ओडिसा, तमिलनाडु और प. बंगाल में 58 वर्ग किलोमीटर कच्छ वनस्पति क्षेत्र में इजाफा हुआ है। पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में भारत के कुल मैंग्रोव का लगभग आधा हिस्सा पैदा होता है। उसके पश्चात् गुजरात और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह का स्थान आता है। तटीय विनियामक क्षेत्र नोटिफिकेशन 1991, जो कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत है, ने मैंग्रोव को पारिस्थितिकीय रूप से काफी संवेदनशील बताया है और इन्हें CRZ-1 में वर्गीकृत किया है जिससे मैंग्रोव क्षेत्रों का उच्च स्तर पर संरक्षण हो सके। राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 ने यह माना से संरक्षण प्रदान करते हैं तथा सतत पर्यटन का संसाधन आधार होते हैं। इस दिशा में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने ओडीशा में राष्ट्रीय मैंग्रोव आनुवंशिक संसाधन केंद्र की स्थापना की। इसका उद्देश्य तटवर्ती राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को नष्ट हो चुके मैंग्रोव क्षेत्रों के पुनर्वास एवं मैंग्रोव आच्छादित क्षेत्रों में वृद्धि करने हेतु सहायता प्रदान करना है।

भारत सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय समन्वय निकाय की स्थापना की गई है जिसने भविष्य में मैंग्रोव की गतिविधि के लिए चार राज्यों- गुजरात, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश एवं ओडीशा का चयन किया है। फरवरी, 2008 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भारत में मैंग्रीवः जैव-विविधता, संरक्षण एवं पर्यावरणीय सेवाएं विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला इस उद्देश्य से आयोजित की कि अनुसंधान सूचना का वितरण संभव हो तथा शोधकर्ताओं एवं पणधारियों के मध्य संप्रेषण हो सके।

  • मैंग्रोव वैसे पेड़-पौधों एवं झाड़ियों का समूह है जो तटीय खारे पानी में उगते हैं। यह 25° उत्तर अक्षांशों से 25° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय सागरीय तट पर विकसित होते हैं। यह एश्च्यूरीज, डेल्टा तथा समुद्री तटरेखा के आसपास ज्वारीय क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते हैं। विश्व में वर्तमान में मैंग्रोव की 110 प्रजातियां ज्ञात हैं।
  • इंडोनेशिया में विश्व के कुल मैंग्रोव वनों का 21 प्रतिशत पाया जाता है जो विश्व में सर्वाधिक है। ब्राजील, आस्ट्रेलिया, मैक्सिको तथा नाइजीरिया में यह विश्व के कुल क्षेत्रफल का क्रमशः9 प्रतिशत, 7 प्रतिशत, 5 प्रतिशत तथा 4.5 प्रतिशत पाया जाता है।
  • मैंग्रोव वनस्पति विश्व के लगभग 117 क्षेत्रों में लगभग 1,90,000 से 2,40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली है।
  • विश्व में सर्वाधिक सघन मैंग्रोव वन मलेशिया के तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत के मैंग्रोव वनों में लगभग 1600 वनस्पतियों एवं 3700 जीवों की पहचान की गई है। पश्चिम बंगाल का सुंदर वन क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।
  • विश्व के कुल मैंग्रोव वनों का पांच प्रतिशत भारत में उपलब्ध है।
  • भारत में 42 वर्गों और 28 समूहों में मैंग्रोव की 69 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 26 अंडमान और निकोबार क्षेत्र में एवं 18 प्रजातियां पूर्वी तट में पाई जाती हैं।
  • भारत में मैंग्रोव की दो देशज प्रजातियां हैं, पहली राइजोफोरा एन्नामलायाना जो किपिचवरम तमिलनाडु में और दूसरी ओडीशा के भीतरकनिका क्षेत्र में पाई जाती है।

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आर्द्रभूमि पक्षियों एवं पशुओं की दुर्लभ जातियों को संरक्षण प्रदान करती हैं। अधिकतर आर्द्रभूमियां प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से नदियों के अपवाह तंत्र से जुड़े होते हैं जैसे- गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदी तंत्र। भारत में आर्द्रभूमियां विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वितरित हैं। ये एक तरफ लद्दाख के शीत शुष्क क्षेत्र में हैं तो दूसरी ओर राजस्थान के गर्म जलवायु क्षेत्र में भी होते हैं।

आर्द्र भूमि के संरक्षण एवं प्रबंधन संबंधी कार्यक्रम सर्वप्रथम 1987 में, मुख्य आर्द्रभूमि के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र में अवस्थिति का व्यापक अध्ययन के उद्देश्य से, प्रारंभ किया गया। आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियां थीं-

  1. नमभूमियों की प्रबंध कार्य योजनाएं तैयार करना और उनका कार्यान्वयन।
  2. उपयुक्त पारिस्थितिकी आधार पर पर्यावरण मुद्दों और नमभूमि के प्रबंधन से सम्बद्ध अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देना।
  3. भारत में नमभूमि स्रोतों का मूल्यांकन
  4. अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

कार्यक्रम की निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं जिनमें इंजीनियरिंग विकल्पों को अपनाने के स्थान पर संरक्षण की जैविक पद्धति पर मुख्य ध्यान दिया गया है। केचमेंट क्षेत्र उपचार के लिए वाटरशेड प्रबंध पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। विभिन्न उद्देश्यों एवं लक्ष्यों- सर्वेक्षण एवं चिन्हीकरण, संरक्षण, वनीकरण, प्राकृतिक पुनर्उत्पादन, प्रदूषण नियंत्रण, खरपतवार नियंत्रण, वन्यजीव संरक्षण, सतत मत्स्य विकास, पर्यावरणीय शिक्षा एवं विशेष पर्यावरण विकास गतिविधियों को जनसहभागिता द्वारा पूरा करना।

दिसम्बर 2008 तक के आंकड़ों के अनुसार 158 अनुबंधित देशों के कुल 1828 नमभूमि क्षेत्रों को रामसर सूची में शामिल किया जा चुका था जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 16,89,85,680 हैक्टेयर (1,68,985 वर्ग किमी.) है। रामसर स्थलों को मान्यता प्रदान करने का सिलसिला 1974 के बाद ही प्रारंभ हुआ।




भारत में अभी तक मात्र 25 नमभूमि स्थलों की रामसर का दर्जा प्राप्त है जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 7 लाख हैक्टेयर है जो क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से विश्व में 39वां है। रामसर श्रेणी में आने वाला अभी देश का सबसे बड़ा नमभूमि क्षेत्र चिल्का झील (1,16,500 हैक्टेयर) व सबसे छोटा रामसर क्षेत्र चंद्रताल (49 हैक्टेयर) है

गौरतलब है कि अभी तक भारत के 24 राज्यों में 94 आर्द्रभूमियां राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम के तहत चिन्हित की गई हैं।

रामसर (आर्द्रभूमि) संधि

रामसर संधि का उद्देश्य है आर्द्र भूमि का संरक्षण। भारत इसमें 1982 में शामिल हुआ। इसके तहत् भारत के 6 आर्द्र भूमि को महत्वपूर्ण वेटलैंड के रूप में चुना गया है- चिल्का झील, केवला देव राष्ट्रीय उद्यान, बूलर झील, हरिके बैराज झील, लोकटक झील तथा सांभर झील।

आर्द्र भूमि संरक्षण हेतु नवीन दिशा-निर्देश

आर्द्र भूमि के संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकार ने 2 दिसंबर, 2010 को नए दिशा-निर्देश जारी किए। इसके अंतर्गत पर्यावरणीय दृष्टि से अति-संवेदनशील इस उच्च जैव-विविधता वाले स्थल को क्षति से बचाने के लिए निर्माण, बिना उपचारित कचरे की डम्पिंग तथा औद्योगीकरण भूमि अवक्रमण तथा अन्य मानवीय गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित है।

सरकार द्वारा अधिसूचित आर्द्र भूमि संरक्षण नियम, 2010 में केंद्रीय, राज्य तथा जिला स्तर पर आर्द्र भूमि विनियामक प्राधिकरण के गठन का प्रावधान किया गया है। इस प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और 11 सदस्य होंगे। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय का सचिव इसका अध्यक्ष होगा। प्राधिकरण पर केंद्र सरकार के अधिनियम में उल्लिखित कानून लागू करना, आर्द्र भूमियों के संरक्षण एवं परिरक्षण हेतु राज्य सरकार की जरूरी सलाह देना, नम भूमि में विनियमित गतिविधियों की प्रक्रिया का निर्धारण करना, स्थानीय प्राधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर आर्द्र भूमि के सीधे प्रभाव क्षेत्र का निश्चय करने, नवीन आर्द्र भूमि की पहचान के प्रस्ताव का आकलन करने, संबंधी जिम्मेदारियां होंगी।

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प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति का मतलब है वह वनस्पति जो मनुष्य द्वारा विकसित नहीं की गयी है । यह मनुष्यों से मदद की जरूरत नहीं है और जो कुछ भी पोषक तत्व इन्हें चाहिए, प्राकृतिक वातावरण से ले लेते है। जमीन की ऊंचाई और वनस्पति की विशेषता के बीच एक करीबी रिश्ता है। ऊंचाई में परिवर्तन के साथ जलवायु परिवर्तन होता है और जिसके कारण प्राकृतिक वनस्पति का स्वरुप बदलता है। वनस्पति का विकास तापमान और नमी पर निर्भर करता है। यह मिट्टी की मोटाई और ढलान जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है। इसे तीन विस्तृत श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: वन, घास स्थल और झाड़ियां।

उष्णदेशीय सदाबहार वन

इन्हें उष्णकटिबंधीय वर्षावन भी कहा जाता है और ये  भूमध्य रेखा के पास के क्षेत्रों में और कटिबंधों के करीब पाये जाते है। यह क्षेत्र गरम होते हैं और यहाँ साल भर भारी वर्षा होती है। इन जंगलों को सदाबहार कहा जाता है क्योंकि इनके पत्ते कभी नहीं झड़ते हैं। पक्की लकड़ी वाले पेड़ जैसे शीशम, आबनूस और महोगनी यहां काफी मात्रा में पाये जाते हैं। भारत में इनका वर्गीकरण इस प्रकार है – पूर्वोत्तर भारत, पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।

उष्णदेशीय पतझड़ी वन

ये वर्षाकालिक वन हैं जो भारत के काफी हिस्सों में पाये जाते हैं, जैसे कि पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान पर, हिमालय के तराई क्षेत्र पर, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश। ये पेड़ पानी के संरक्षण के लिए शुष्क मौसम में अपने पत्ते गिरा देते हैं। साल, सागौन, नीम और शीशम पक्की लकड़ी वाले  पेड़ हैं जो इन जंगलो में पाये जाते हैं। बाघ, शेर, हाथी, लंगूर और बंदर इन क्षेत्रों में पाये जाने वाले आम जानवर हैं।

उष्णदेशीय शुष्क पतझड़ी वन

यह वनस्पति उन क्षेत्रों में पायी जाती है जहां वार्षिक वर्षा 50 और 100 सेमी के बीच होती है। यह पूर्वी राजस्थान, उत्तरीगुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, दक्षिणपश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी घाट के बारिश वाले क्षेत्र में पाये जाते है।

रेगिस्तान और अर्द्ध शुष्क वनस्पति

इस तरह की वनस्पति 50 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पायी जाती है। यहां पेड़ छोटी झाड़ियों के रूपों में होते हैं। आम तौर पर उनकी अधिकतम ऊंचाई 6 सेमी तक होती है। इन पेड़ों की जड़ें गहरी, मोटी और पत्तियां कांटेदार होती है। यह वनस्पति पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात और पश्चिमी घाट के बारिश वाले क्षेत्र में पायी जाती  है।

सदाबहार वनस्पति

यह समुद्र-तट और निचले डेल्टा क्षेत्रों में पाया जाता है। इन क्षेत्रों में, उच्च धारा की वजह से खारा पानी फैलता है। यहाँ मिट्टी दलदली होती है। गंगाब्रह्मपुत्र डेल्टा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि नदियों के डेल्टा क्षेत्र और पूर्वी और पश्चिमी तट के कुछ हिस्से इस वनस्पति के तहत आते है।

नम उप-उष्णदेशीय पर्वतीय वनस्पति

यह वनस्पति 1070-1500 मीटर की ऊंचाई पर प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है। यह वनस्पति सदाबहार है। पेड़ों की लकड़ी लगभग नरम होती हैं। यह पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, नीलगिरी, कार्डामम हिल्स और अन्नामलाई की पहाडी जैसे क्षेत्रों में पाया जाती है।

नम शीतोष्ण पर्वतीय वनस्पति

यह वनस्पति 1500 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाती है। यह ज्यादातर प्रायद्वीपीय भारत में पायी जाती है। इसके जंगल बहुत घने नहीं होते। वहाँ सतह पर झाड़ियां होती हैं। यह अन्नामलाई की पहाड़ियों, नीलगिरि और पालनी में पाया जाता है। इस जंगल के मुख्य पेड़ हैं – मैगनोलिया, युकलिप्टुस, और एल्म।

हिमालयी वनस्पति

ऊंचाई में भिन्नता के अनुसार कई तरह की प्रजातियां इन पहाड़ों में पायी जाती है। ऊंचाई में वृद्धि के साथ, तापमान में गिरावट आती है। 1500 मीटर से लेकर 2500 मीटर तक की ऊंचाई के बीच के पेड़ों का आकार शंकु की तरह होता है। चीड़, पाइन और देवदार महत्वपूर्ण शंकुधारी पेड़ हैं जो इन जंगलों में पाए जाते हैं।

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वनस्पति

वनस्पति
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– प्राकृतिक रूप से उगने वाले तथा फलने-फूलने वाली।
– भारत का कुल क्षेत्रफल 3287263 वर्ग किलोमीटर हैं।
– जिसके वन क्षेत्र 21.68 % भू-भाग पर हैं।
– भारत के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में 20.6 % पर उत्तरी पष्चिमी भाग में 10.7 % मध्यवर्ती भाग में 30 %
और दक्षिणी भाग में 18% वन प्रदेष फैले हुये है।

मध्यप्रदेश में 35 % बिहार में 22 %
केरल में 22.7% आंध्रप्रदेश में 20.5 %
कर्नाटक में 14% गुजरात में 15%
अंडमान निकोबार में 73 % राजस्थान में 4.1 %
उत्तर प्रदेश में 11.9 %

– भारत के कुल वन क्षेत्र का 93 %, उष्ण कटिबंधीय वन पाये जाते हैं।
– भारत के कुल वन क्षेत्र का 80% मानसूनी वन पाये जाते हैं।
– भारत के कुल वन क्षेत्र का 12% सदाबहार वन पाये जाते हैं।
– भारत के कुल वन क्षेत्र का 1% अन्य वन पाये जाते हैं।
– भारत मानसूनी जलवायु में स्थित हैं जहां र्गिर्मयों में वर्षां व सर्दियां शुष्क रहती हैं।
– भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधीय हैं, क्योंकि भारत की स्थिति कर्क रेखा के आसपास हैं।
– उष्ण कटिबंधीय जलवायु की मुख्य विशेषता त्र 18 Degree तापमान हैं।
– वर्ष के अधिकांश महिनों में गर्मी पड़ना।
– ये सभी परिस्थितियां भारत में हैं अतः भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधीय हैं।
वनस्पति का वर्गीकरण
(1) उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वनस्पति:-
– यहां वर्षा की मात्रा 250 सेमी से अधिक होती हैं एवं वार्षिक औसत तापमान 28 Degree होता हैं और
वर्ष के लगभग 8 महीने तक वर्षां होती हैं। ऐसी वनस्पति निम्न क्षेत्रों में पाई जाती हैं:-
– उत्तर में हिमालय की तराई
– पश्चिमी घाट न्याला बार, कर्नाटक, केरल का पश्चिमी तट, नीलगिरी की पहाड़ियाँ अन्नामलाई
की महाड़ियाँ, ईलायची की पहाड़ियाँ
– अण्डमान निकोबार
– पूर्वांचल में (7 राज्य)
इन वनों का क्षेत्रफल कुल वनों का 24,800 वर्ग किलोमीटर हैं। यह विश्व की सर्वाधिक जैव विविधता वाले
वन हैं। इन वनस्पतियों में पाये जाने वाले पेड़ निम्न हैं:-



महोगनी एबोनी रोजवुड
सिनकोना आयरन वुड रबड़
आबनूस बांस जंगली आम
तूलसर गुरजन चंदन

– विषुवत रेखा के आसपास इस प्रकार के पेड़ सर्वाधिक पाये जाते हैं। ये विश्व के घने, दलदली कठोर पेड़
हैं। जिनकी ऊँचाई 100 मीटर तक होती हैं। ये काले घने वन हैं।
– आर्थिक दृष्टि से इन वनों का महत्व नहीं हैं।
उष्ण कटिबंधीय अर्धसदाबहार वन

– इनमें वर्षां की मात्रा 200-250 सेमी तक होती हैं।
– असम, पश्चिम बंगाल तटीय उड़ीसा पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में दिये वन कम घने और लताओं वाले होते
हैं।
– इसमें कदम्ब, चंपा, आम, काजू के वृक्ष पाये जाते हैं।
उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन (मानसूनी वन)
– यहां वर्षा की मात्रा 150-200 सेमी होती हैं।
– पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छोटा नागपुर, पष्चिमी घाट का पूर्वी ढ़ाल, महाराष्ट्र, पश्चिमी मध्यप्रदेश,
छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु के आंतरिक भाग में पाये जाते हैं।
– साल, सागवान, चंदन, महुआ, खैर, नीम आदि पेड़ पाये जाते हैं।
– यह वन भारत में सर्वाधिक पाये जाते हैं। यह भारत की मौलिक वनस्पति हैं।
– इस वनस्पति को दो भागों में बांटा जाता हैं।
मानसूनी वन (भारत के मूल वन)
उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन आर्द्र पर्णपाती वन
(पश्चिमी भाग) (पूर्वी भाग)
1. उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन।
2. उष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन।
सगवान के वृक्ष:-
– शुष्क पर्णपाती वनों का प्रकार हैं।
– इनका मुख्य केन्द्र चन्द्रगिरी (महाराष्ट्र में) हैं।
साल के वृक्ष:-
– आर्द्र पर्णपाती वनों में पाया जाता है। पूर्वी भारत में
– इनका मुख्य केन्द्र जबलपुर (मध्यप्रदेष) में हैं।
चन्दन के पेड़:-
– आर्द्र पर्णपाती वनों में ही पाया जाता हैं।
– इनका मुख्य केन्द्र मैसूर कर्नाटक में हैं।
उष्ण कटिबंधीय शुष्क कंटीले वन
– यहा वर्षां की मात्रा 50-100 सेमीं तक होती हैं और आर्द्रता 50 % तक होती हैं।
– यहां तापमान 20.35 degree होता हैं।
– ऐसे भागों में छोटे पतझड़ प्रकार के वन पाये जाते हैं।
– इनकी ऊँचाई 6 से 9 मीटर होती हैं। इनकी जड़े पतली, लंबी गहरी होती हैं।
– ऐसे वन आंतरिक पठारी भाग, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तरी पंजाब में जाये जाते
हैं।
– ऐसे वनों में कुछ वृक्ष मोटी पत्ती वाले कांटेदार होते हैं। जिससे तीव्र वाष्पीकरण से बचा जा सके।
– ऐसे वनों में खेजड़ी, बबूल, कैर, खजूर, खैर, एकेसिया, महुआ आदि वृक्ष पाये जाते हैं।
अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय पहाड़ी वन
– यह वन उष्ण कटिबंधीय हरे-भरे वनों से मिलते-जुलते होते हैं।
– यह धरातल से 1500 मीटर की ऊँचाई पर पाये जाते हैं।

– ये वन नीलगिरी, अन्नामलाई, पालनी, सेवराय की पहाड़ियों, महाराष्ट्र में महाबलेश्वर, मध्यप्रदेश में
पंचमढ़ी क्षेत्रों में पाये जाते हैं।
– उत्तर भारत में ऐसे वन पूर्वी हिमालय व असम में पाये जाते हैं। इन वनों के अंतर्गत देवदार, चीड़,
चेन्टनट, लॉरेल, एलनस, बेथुला जैसे पेड़ पाये जाते हैं।
– अनुकूल परिस्थितियों में इनकी ऊँचाई 40-50 मीटरतक हो जाती हैं।
हिमालय वनस्पति
– यहां वर्षां की मात्रा 75-125 सेमी. तक होती हैं।
– जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश और सम्पूर्ण हिमालय की निचली पहाड़ियों में
पायी जाती हैं।
– ये चौड़ी पत्ती वाले कोणीय वन होते हैं। ऐसे वनों में पाइन, चीड़, ओक, ब्लूपाइन, सिल्वर फर, चेस्टनट,
देवदार जैसे पेड़ पाये जाते हैं।
मैंग्रो वनस्पति
– यहां वर्षां की मात्रा 40 से 200 सेमी. हैं।
– ऐसे वन समुन्द्री तटों पर पश्चिमी घाट, गंगा के डेल्टा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी के
डेल्टायी भागों में पाये जाते हैं।
– ऐसे वनों का सर्वोत्तम उदाहरण सुन्दरवन हैं।
– ज्वार के कारण खारा पानी, स्वच्छ पानी के निचले तटीय भागों में मिलकर ऐसी वनस्पति को उगने में मदद
करते हैं। एसे वनस्पति की जड़ें अवस्तम्भ होती हैं। जड़े आरोही लतायुक्त होती हैं।
– ऐसे वनस्पति समुन्द्री परिस्थिति का उदाहरण हैं।
– ऐसे वनों में पाये जाने वाले पेड़ सुनदरी, नारियल, केवड़ा, बेत आदि प्रमुख हैं।
– ज्वारीय वन लवणता वाली वनस्पति हैं।
नोट: (1) कच्छ का रन (2)तमिलनाडु का तट (मेरीन बीच) (3) गंगा का डेल्टा
शीतोष्ण वन
– 1800 मीटर की ऊँचाई वाले, हिमालय के पूर्वी भाग में पाये जाते हैं।
– सदाबहार, कोणधारी प्रकार के वन हैं।
– जिसमें पाईन, देवदार, चेस्टनट आदि वन पाये जाते हैं।
– पश्चिमी हिमालय में ऐसी वनस्पति 1500 मीटर की ऊँचाई वाले भागों में पाई जाती हैं।
अल्पाई वन




– 3500 मीटर से ऊँचाई वाले भागों में पाये जाते हैं।
– पूर्वी हिमालय में सर्वाधिक पायी जाती हैं।
– ये पौधे छोटे और मुलायम होते हैं।
– जैसे स्प्रुस, फर, वर्च, जूनीकर, मुलायम छोटी घास।
– इसके पथरीले भागों में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं।
– इन क्षेत्रों में हिमपात नहीं होता हैं या कम होता हैं।
मरूस्थलीय वनस्पति

– पश्चिमी राजस्थान के थार के मरूस्थल में पायी जाती हैं।
– ऐसी वनस्पति के जीरोफाइट/जैलोफाइट कहते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से भारत का वन प्रदेश
भारत को छः भागों में बांटा जाता हैं।
(1) पूर्वी हिमालय के वन:-
इसके अंतर्गत अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय शीतोष्ण कटिबंधीय वन, शीत शीतोष्ण कटिबंधीयवन, उच्च पर्वतीय वन
पाये जाते हैं।
> अर्द्ध उष्णबंधीय वन:- पूर्वी तराई वाले भागों में 1500 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।
> शीतोष्ण कटिबंधीय वन:- 1500-2700 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।
> शीत शीतोष्ण कटिबंधीय वन:- 2700-3600 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।
> उच्च पर्वतीय वन:- 3600-4800 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।
(2) पश्चिमी हिमालय के वन:-
> अर्द्ध उष्णकटिबंधीय वन:- साल, बांस, ढ़ाक, ताड़, शीशम
> शीतोष्ण कटिबंधीय:- 1500-3600 मीटर तक होते हैं। चीड़, देवदार, ब्लूपाईन, एल्डर, बर्न, पोपलर।
विभिन्न प्रकार के गुलाब की झाड़ियाँ।
> पर्वतीय वन:- 3600 से 4500 मीटर तक ऊँचाई होती हैं। सिल्वर फर, बर्न, जूनीफर प्रकार के पेड़
पायें जाते हैं।
(3) सतलज बेसिन के वन:-
निम्न हिमालय व अरावली के ढ़ालों को छोड़कर नदी बेसिन में ऐसी वनस्पति पायी जाती हैं जो झाड़ियों के रूप में
मिलती हैं। ये सूखा सहन कर सकती हैं। ऐसी वनस्पति पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान, गुजरात में कच्छ
तक फैली हुई हैं। यह वनस्पति उष्ण कटिबंधीय प्रकार की हैं जो गर्मियों में पत्ते गिरा देती हैं। जैसे:- पीपल,
नीम, शीषम, गूलर, बबूल आदि के वृक्ष पाये जाते हैं।
(4) गंगा मैदानी वनस्पति
> यह मैदानी प्रकार की वनस्पति हैं।
> ऐसे वनों में फलदार वृक्ष आते हैं।
> नीम, यूकेल्प्ट्सि, शीशम, शहतुत आदि पाये जाते हैं। (इसके अलावा)
(5) मालाबार तट के वन:-
> यहां तर और उष्ण जलवायु पाई जाती हैं।
> नरियल, रबड़, सुपारी, कालीमिर्च, कटहल, पान की लतायें आदि पाई जाती हैं।
> ऐसे वनों में पेड़ों की किस्म अधिक होने के कारण इन्हें ैभ्व्स्। थ्वतमेज कहते हैं। (सोलो त्र विशाल वन)
(6) दक्कन के वन:-
> यहां वर्षां की मात्रा 200 सेमी से अधिक होने के कारण सागवान, लाल चंदन, सफेद चंदन, साल,
> सेटिन वुड़ प्रकार के पेड़ पाये जाते हैं।
वनों की उपजें
1. श्वेत सनोंवर :-
> इनकी ऊँचाई 3000 मी. तक होती हैं।

यह जम्मू-कश्मीर/हिमालय के उत्तर में पाये जाते हैं।
> इनका उपयोग संदूक, दियासलाई, कागज की लुगदी, पैकिंग की तख्तियां बनाने में किया जाता हैं।
2. देवदार:-
> इनकी ऊँचाई 1700 से 2400 मीटर तक होती हैं।
> यह जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश आदि में पाये जाते हैं।
> इनका उपयोग सुंगधित तेल बनाने में किया जाता हैं। इनकी लकड़ी सुगंधित होती हैं।
3. चीड़:-
> इनकी ऊँचाई 1000 से 2000 मीटर तक होती हैं।
> यह जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, नेपाल में पाये जाते हैं।
> इनका उपयोग तारपीन का तेल, प्लाईबोर्ड़ बनाने में किया जाता हैं।
4. स्प्रुस:-
> इनकी ऊँचाई 2100-3600 मीटर की ऊँचाई तक होती हैं।
> इनका उपयोग मकानों की छत बनाने में किया जाता हैं।
उपरोक्त चारों हिमालय वनस्पति हैं।
मानसूनी वन निम्नलिखित हैं:-
5. सागवान:- पश्चिमी भारत में
6. साल:- पूर्वी भारत में
7. शीशम:- उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा।
8. चंदन:- दक्षिण भारत, तमिलनाडु, कर्नाटक
9. सुन्दरी:- गंगा के डेल्टा (नाव बनाने में काम आता हैं)
10. अर्जुन:- रेशम के कीड़े पाले जाते हैं। सागवान की तरह कठोर होता हैं।
11. पलाश:- छोटा नागपुर व दक्षिणी पूर्वी राजस्थान में। इसकी पत्तियों पर लाख के कीड़े बनते हैं।
12. रोजवुड़:- पश्चिमी घाट, तमिलनाडु, केरल
13. लाख:- भारत लाख उत्पादन में प्रथम स्थान पर हैं। लाख के कीड़े को लेसिफर लक्का कहते हैं। लाख के
कीड़े कुसुम, बरगद, खेर, पीपल, गुलर, पलाश वृक्षों की छाल से रस को चूसकर एक प्रकार का पदार्थ बनाते हें।
उड़ीसा, बिहार, झारखण्ड राज्यों में लाख का उत्पादन सर्वाधिक होता हैं।
14. कागज की लुगदी:- स्प्रुस, चीड़, मूंज, संवाई भाबर, बैब, हाथी घास आदि से लुगदी तैयार की जाती हैं।
घासें


1. खस:- राजस्थान में संवाई माधोपुर, टोंक, भरतपुर, मध्यप्रदेश में ग्वालियर में पाई जाती हैं।
2. रोसा :- दक्षिण भारत, मध्यप्रदेश में पायी जाती हैं। इससे सुगन्धित तेल व कृत्रिम सुगंध पाई जाती हैं।
3. अग्नि घास (लेमन घास):- यह कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु में पाई जाती हैं। इससे नींबू की सुंगध वाले पदार्थ
तैयार किये जाते हैं। सुगन्धित प्रसाधन सामग्री व नहाने के साबुन भी बनाये जाते हैं।

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