पन्हाला दुर्ग


पन्हाला दुर्ग

पन्हाला दुर्ग महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। यह दक्खन के बड़े क़िलों में से एक है, जिसका निर्माण शिल्हर शासक भोज द्वितीय ने सन 1178 से 1209 के बीच सहयाद्रि पर्वत श्रंखला से जुड़े ऊंचे भू-भाग पर करवाया गया था। इस क़िले का आकार कुछ त्रिकोण-सा है और चारों ओर के परकोटे की लम्बाई लगभग 7.25 किलीमीटर है। यह क़िला कई राजवंशों के आधीन रहा था। यादवों, बहमनी, आदिलशाही आदि के हाथों से होते हुए यह 1673 में शिवाजी के कब्जे में आ गया था।

इतिहास



छत्रपति शिवाजी इस क़िले पर 1651 से ही लगातार आक्रमण करते आ रहे थे। इस पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद उन्होंने इस क़िले को अपना मुख्यालय बना लिया था। यद्यपि वे पूरे वक्त किसी न किसी सैनिक अभियान में लगे रहे, लेकिन यही वह जगह है, जहाँ उन्होंने सबसे अधिक समय बिताया था। 1689 से दो बार यह क़िला मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के कब्जे में भी चला गया था, लेकिन हर बार मराठे उसे वापस लेने में सफल रहे।

पन्हाला दुर्ग पर 1659 ई. में मराठा प्रमुख और ‘महाराष्ट्र केसरी’ शिवाजी तथा बीजापुर के सेनापति रनदौला और रुस्तमे ज़मान के बीच एक मुठभेड़ हुई थी। रुस्तमे ज़मान बीजापुररियासत के दक्षिण-पश्चिमी भाग का सूबेदार था। उसने अफ़जल ख़ाँ की मृत्यु के पश्चात बीजापुर की ओर से अफ़जल ख़ाँ के पुत्र फ़जल ख़ाँ को साथ लेकर शिवाजी पर चढ़ाई की। पन्हाला की लड़ाई में रुस्तमें जमान बुरी तरह से हारकर कृष्णा नदी की ओर भाग गया। मई, 1660 में बीजापुर की ओर से सिद्दी जौहर ने पन्हाला के क़िले को घेर लिया, किन्तु शिवाजी वहाँ से पहले ही निकल चुके थे।

संरचना

इस क़िले तक पहुँचने के मार्ग में ही तालाब के सामने हरे और सफ़ेद रंग से पुती एक दरगाह है, जिसके थोड़ा आगे जाकर तीन दरवाज़े से प्रवेश करते हैं। क़िले के अन्दर एक कोठी है, जिसे ‘सज़ा कोठी’ कहा जाता है। इसका निर्माण इब्राहीम आदिलशाह द्वारा सन 1500 में किया गया था। इसी कोठी में शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी को क़ैद करके रखा गया था। शिवाजी संभाजी की उद्दण्डता और अय्याशी आदि के कारण परेशान हो गए थे। इसी क़िले में शिवाजी को सिद्दी जोहर की सेना ने चार महीने तक घेरे रखा और अंततः एक दिन बारिश की रात में शिवाजी वहाँ से निकल भागे।



जब कि उनके स्वामिभक्त सेनापति बाजीप्रभु देशपांडे ने दुश्मनों को पवनखिंड में ही रोके रखा और अंततः अपने प्राणों की आहुति दी। इस क़िले के अन्दर ही अन्न भण्डारण का ‘अम्बरखाना’ है एवं जल संग्रहण की बड़ी ही उत्तम व्यवस्था है। कुछ दीवारों और दरवाज़ों में पत्थरों के जोड़ जहाँ होते हैं, वहाँ शीशा भरा गया है।

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