पं. जवाहरलाल नेहरु पर निबंध


पं. जवाहरलाल नेहरु पर निबंध

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पं. जवाहरलाल नेहरु पर निबंध

भूमिका : कालचक्र के परिभ्रमण के साथ विश्व-इतिहास और मानवीय सभ्यता के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुए हैं। इस परिवर्तन की प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप समाज, देश, सभ्यता तथा मूल्यों में परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों को रूप देने वाले और नवीन सिद्धांतों की स्थापना करने वाले व्यक्ति भी इतिहास के ही अंग बन जाते हैं।

इस तरह के व्यक्तित्व कभी धर्म और दर्शन के क्षेत्र में कभी ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में तो कभी राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में प्रकट होते हैं तथा अपनी मान्यताओं और कार्यों से विश्व इतिहास को एक नयी दिशा देते हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में जवाहर लाल नेहरु ऐसे ही गौरवशाली व्यक्तित्व के रूप में प्रकट हुए थे।

देश की स्वतंत्रता के लिए और देश के नव निर्माण के लिए अपने जीवन को अर्पण करने वाले विश्वविख्यात राजनीतिज्ञ पंडित जवाहर लाल नेहरु जी को सभी जानते हैं। जवाहर लाल नेहरु जी वे कड़ी थे जिन्होंने परतंत्र भारत को स्वतंत्र भारत के साथ जोड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नेहरु जी शांति के उपासक, पंचशील के अधिष्ठाता, बच्चों के चाचा नेहरु इतिहास में अमर हो गए हैं।

नेहरु जी का जन्म : पंडित जवाहर लाल नेहरु जी का जन्म 14 नवम्बर , 1889 को इलाहबाद में हुआ था। इनका जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। नेहरु जी की माँ का नाम स्वरूपरानी थुस्सू था और पिता का नाम मोतीलाल नेहरु था। नेहरु जी के पिता एक वकील थे।

नेहरु जी के पिता पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित थे। नेहरु जी अपने पिता के इकलौते बेटे थे और नेहरु जी की तीन बहनें भी थीं। नेहरु जी की एक बहन का नाम विजयलक्ष्मी पंडित था। नेहरु जी का परिवार जितना ही साधन-संपन्न था उतना ही ख्याति प्राप्त भी था।

शिक्षा : नेहरु जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही अंग्रेजी अध्यापकों की देख-रेख में हुई थी। बचपन में उनका पालन-पोषण राजकुमार की तरह हुआ था। नेहरु जी ने खुद पुस्तक पढने की रूचि को पैदा किया था। नेहरु जी के अध्यापक कुछ आध्यात्मिक अधिक थे इसलिए नेहरु जी भी आध्यात्मिक बनने लगे।

पिता जी को यह अच्छा नहीं लगा और सन् 1904 में 15 साल की उम्र उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लेंड भेज दिया गया। इंग्लैण्ड में नेहरु जी ने सात साल तक अध्धयन किया। इंग्लेंड में उन्होंने हेरो विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। सन् 1907 ई० में नेहरु जी ने ट्रिनिटी कालेज से बी० एस० सी० की परीक्षा उत्तीर्ण की थी उसके बाद क़ानूनी शिक्षा के लिए नेहरु जी ने बार-एट-ला में प्रवेश लिया था। सन् 1912 में बैरिस्टरी की परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद वे भारत लौटे थे।

जीवन : नेहरु जी में अध्धयन की भावना बहुत ही प्रबल थी। नेहरु जी बहुत ही अच्छे से अपने कर्तव्य को निभाना जानते थे। नेहरु जी ने इंग्लैण्ड से अपनी वकालत की शिक्षा को पूरा किया था। पिता जी की इच्छा थी कि उनका पुत्र उनकी तरह ही एक विख्यात वकील बने इसलिए नेहरु जी ने भी पिता के साथ वकालत में सहयोग देना शुरू कर दिया।

एक तरफ वकालत चलती दूसरी तरफ विख्यात राजनीतिज्ञ मोतीलाल नेहरु के घर आते और राजनीतिक चर्चा करते। इस के फलस्वरूप नेहरु जी पर भी कुछ-कुछ राजनीतिक प्रभाव पड़ने लगा। नेहरु जी का विवाह सन् 1916 में कौल की पुत्री कमला से हुआ था। सन् 1917 में कमला को एक पुत्री हुई जिसका नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी रखा गया था।

कुछ समय के बाद एक लड़का पैदा हुआ लेकिन वह जीवित न रह सका। जब सन् 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था तब उस हत्याकांड को देखकर नेहरु जी की आत्मा कांप उठी और तभी से वे राजनीतिक नेताओं से संपर्क में आने लगे। नेहरु जी को सन् 1921 से छ: महीने की और सन् 1922 में अठारह महीने की कैद की सजा मिली थी और दूसरी तरफ नेहरु जी की पत्नी कमला का स्वास्थ्य भी बिगड़ता चला गया।

नेहरु जी सन् 1927 में स्विट्जरलैंड गये थे। वहां पर जाकर उन्होंने बहुत से नेताओं से भेंट की। नेहरु जी ने 26 जनवरी , 1930 को रावी नदी के किनारे शाम के समय तिरंगा फहराते हुए कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्त करके ही रहेंगे। कांग्रेस के इस प्रस्ताव से अंग्रेज बौखला उठे। अंग्रेजों ने दमन चक्र शुरू किया इसके दौरान कमला बीमार हो गईं।

अंत में सन् 1936 में कमला का देहांत हो गया। दूसरी तरह नेहरु जी के पिता जी की भी मृत्यु हो गई। इन सभी कष्टों के बाद नेहरु जी राजनीतिक कार्यों में अधिक भाग लेने लगे थे। गाँधी जी के पथप्रदर्शन से नेहरु जी का व्यक्तित्व विकसित होने लगा था। अनेक संघर्षों के पश्चात अंग्रेज 15 अगस्त , 1947 को भारत छोडकर चले गए।

राजनीति में प्रवेश : नेहरु जी कांग्रेस के अधिवेशन में सन् 1915 में पहली बार शामिल हुए थे। इसमें गाँधी जी ने रोलेक्ट एक्ट के खिलाफ आवाज उठाई थी। रोलेक्ट एक्ट, पंजाब मार्शल ला, जलियांवाला बाग का गोली कांड, इन वीभत्स घटनाओं ने नेहरु जी के ह्रदय को झंझोर कर रख दिया था।

नेहरु जी सन् 1919 में राजसी वेशभूषा छोडकर सादगी का जीवनयापन करते हुए विधिवत राजनीति में शामिल हो गये थे। नेहरु जी को सन् 1924 को इलाहबाद के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। नेहरु जी ने 2 साल तक कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य किया था। सन् 1926 में ब्रिटिश अधिकारीयों से सहायता न मिलने पर नेहरु जी ने इस्तीफा दे दिया।

जवाहर लाल नेहरु जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के नेता के रूप में सन् 1926 से 1928 तक कार्य किया था। मोतीलाल की अध्यक्षता में कांग्रेस का वार्षिक स्तर का आयोजन किया तभी सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरु जी ने पूर्ण राजनीतिक की स्वतंत्रता की मांग की थी जबकि मोतीलाल नेहरु और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर ही संपन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग की थी।

इन दोनों के बीच की बहस को गाँधी जी ने हल निकालने के लिए कहा कि ब्रिटेन को भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करेगी। नेहरु जी और बोस जी ने मांग की कि इस समय को कम करके एक साल का कर दिया जाए जिस पर ब्रिटिश सरकार का कोई फैसला नहीं आया।

दिसम्बर के महीने में कांग्रेस के अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरु जी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। उसी समय पर पूर्ण स्वराज की मांग भी की गई थी। यह अधिवेशन लाहौर में हुआ था।

राष्ट्रिय आंदोलन में भाग : राजनीति में प्रविष्ट होने के बाद नेहरु जी स्वतंत्रता आंदोलन में सुचारू रूप से भाग लेने लग गये थे। सन् 1921 में हुए किसान आंदोलन में और असहयोग आंदोलन में भाग लेने की वजह से राजनैतिक सूझ-बूझ व कर्मठता की वजह से उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। लाहौर के इसी अधिवेशन में भारत की स्वाधीनता का प्रस्ताव भी रखा गया था।

जिसके फलस्वरूप 26 जनवरी , 1930 से हर साल स्वाधीनता आंदोलन मनाया जाता है। सन् 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की वजह से उन्हें दुबारा जेल जाना पड़ा था। सन् 1935 में प्रांतीय मंत्रिमंडल कांग्रेस की भागीदारी से बना था। नेहरु जी ने लोगों का कुशल, मार्गदर्शन किया था। सन् 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही थी जिससे हजारों अन्य नेताओं के साथ नेहरु जी को भी जेल में डाला गया था।

नेहरु जी के अथक प्रयास, अपूर्व त्याग और बलिदान से 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया था। जवाहर लाल नेहरु जी ने 26 जनवरी, 1930 को लाहौर में स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया था। सन् 1930 में गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की और वह आंदोलन इतना सफल हुआ कि ब्रिटिश को एक महत्वपूर्ण निर्णय के लिए मजबूर होना पड़ा।

ब्रिटिश सरकार ने अधिनियम लागु करने का प्रस्ताव रखा तब कांग्रेस ने चुनाव लड़ना ही ठीक समझा, नेहरु जी ने चुनाव के दौरान पार्टी का समर्थन चुनाव से बाहर रहकर ही किया था। कांग्रेस ने सबसे अधिक जगहों पर जीत हांसिल की थी। नेहरु जी को कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री : सन् 1947 को भारत को आजादी मिल गई थी। उस समय यह बात हुई कि प्रधानमंत्री के लिए कांग्रेस में मतदान हुआ। मतदान में सरदार पटेल को सबसे ज्यादा मतदान मिले और उनके बाद सबसे ज्यादा मत आचार्य कृपलानी को मिले लेकिन गाँधी जी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपने नाम वापस ले लिए और जवाहर लाल नेहरु जी को प्रधानमंत्री बनने दिया था।

भारत के स्वतंत्र होने के बाद वे सर्वसम्मती से देश के प्रधानमंत्री चुने गये थे। जब से भारतीय संविधान लागू हुआ उसके बाद सन् 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का बहुमत होने की वजह से नेहरु जी को ही प्रधानमंत्री चुना गया था। नेहरु जी 18 सालों तक भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में कार्यरत रहे थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद अपने प्रधानमंत्रित्व काल में नेहरु जी ने जिस क्षेत्र में भी जिस परंपरा की नींव को डाला था वह परम्परा भविष्य तक बनी रहेगी।

नेहरु जी के नेतृत्व में देश प्रगति की ओर अग्रसर हुआ। जब नेहरु जी भारत के प्रधानमंत्री बने तो वे भारत के सपनों को साकार करने के लिए चल पड़े थे। भारत के अधिनियम लागु होने के बाद नेहरु जी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक सुधारों के लिए योजना बनाने लगे। नेहरु जी ने बहुवाचनी दलीय को बनाए रखा और अंग्रेजी शासन से भारत को एक गणराज्य देश बना दिया।

नेहरु जी ने देश के ओद्योगीकरण की तरफ कदमों को बढ़ाया। वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में इस तरफ आए बिना उन्नति संभव नहीं थी। अत: बड़े-बड़े कल कारखाने आरंभ हुए और बड़े-बड़े बांध बनाए गए। वैज्ञानिक क्षेत्र में अनुसंधान हुए। इन्ही को नेहरु आधुनिक मंदिर मानते थे। परमाणु शक्ति के विकास की आधारशिला रखी गई। रेल के इंजन, कारें और हवाई जहाज का निर्माण अपने देश में आरंभ हुआ।

नेहरु जी की विदेश नीति : नेहरु जी ने विदेश नीति में अपनी एक अलग भूमिका निभाई थी। विदेश नीति के क्षेत्र में भारत पूरी दुनिया में उभर कर सामने आया। नेहरु जी ने संसार के हर छोटे-बड़े राष्ट्रों से अपने मधुर संबंध बनाने की कोशिश कीं। नेहरु जी ने भारत के उत्थान के लिए विश्व के सभी गुटों में सहयोग लिया था।

नेहरु जी ने संसार में सबके साथ समान संबंध की नीति के स्वरूप अपनी तटस्थता की नीति सुनिश्चित की थी। नेहरु जी ने प्रगतिशील देशों को प्रगति के लिए संगठित किया था। उन्होंने सभी को गुटों से मुक्त करके गुट निरपेक्ष आंदोलन की नींव डाली थी। आज के समय में गुट-निरपेक्ष आंदोलन संसार में सफलतापुर्वक चल रहा है।

नेहरु जी ने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाये थे। नेहरु जी ने विदेश नीति में भारत को दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय नायक के रूप में दिखाया और गैर निरपेक्ष आंदोलन में सबसे आगे रहे। नेहरु जी ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद को खत्म करने के लिए जोसिप बरोज टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एक गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना की।

नेहरु जी ने अपना योगदान कोरियाई युद्ध का अंत करने , स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को अन्य समस्याओं को सुलझाने में दिया था। भारत देश में पंचशील और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को अपनाया गया। भारत ने रूस, अमेरिका और चीन के साथ मैत्री संबंध बनाया और इंडोनेशिया और कोरिया के साथ भी जुड़ा।

सन् 1962 में जब चीन ने मैत्री के नारे के साथ भारत की पीठ में चाकू घोंपा तो नेहरु जी को बहुत अघात पहुंचा। इसके बाद भारत सैन्य विकास की ओर बढने लगा। शस्त्रों के बड़े-बड़े कारखाने बनाये गये इसी तरह से नव भारत का निर्माण हुआ था।

विश्व शांति : विश्व में सभी देशों में आपसी मेल और संबंध बढ़ाने के लिए नेहरु जी ने हमेशा अथक प्रयास किये। नेहरु जी ने पंचशील के सिद्धांतों को संसार के सामने रखा और विश्व शांति का प्रचार भी किया। विश्व शांति के लिए उनके द्वारा किये गये प्रयासों की वजह से नेहरु जी को विश्व शांति का अग्रदूत माना जाता है।

विभिन्न राष्ट्रों में बढ़ रही वैमनस्यता को दूर करने और उन्हें एक-दुसरे के पास लाने में नेहरु जी का बहुत प्रयास रहता था। नेहरु जी की शांतिपूर्ण नीतियों ने ही तीसरे विश्व युद्ध की भड़कती हुई आग को रोका था। नेहरु जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों ने 500 देशी रियासतों को रिहा किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरु जी के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि सभी आजाद लोगों को एक झंडे के सामने लाना है और उन्होंने भारत को दुबारा बनाया और आगे आने वाली हर समस्या का सामना समझदारी के साथ किया था।

जवाहर लाल नेहरु जी ने आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिया था नेहरु जी ने विज्ञान और विश्व प्रोद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया था इसके साथ-साथ नेहरु जी ने तीन पंचवर्षीय योजनाओं का भी शुभारंभ किया था। नेहरु जी के कारण उनके नीतिओं और निर्णयों की वजह से देश में कृषि व उद्योग की लहर आ गई।

व्यक्तित्व : जवाहर लाल नेहरु जी को अपने ऊपर पूरा भरोसा था। नेहरु जी का मानना था कि अगर कोई काम दृढ संकल्प से किया जाए तो कोई भी ऐसा कारण नहीं मिलता है जिसकी वजह से वह काम पूरा न हो सके। इसीलिए भारत के आजाद होने से पहले ही उन्हें भरोसा था कि हम आजाद होकर ही रहेंगे और उन्हें दृढ विश्वास था कि आजाद होकर हम स्वतंत्रता की रक्षा कर सकेंगे और समस्याओं को भी सुलझा सकेंगे।

नेहरु जी प्रारंभ से ही अधिक परिश्रमी थे। निराशा कभी भी उनके मुख पर झलकती नहीं थी। नेहरु जी कभी भी कार्यों से नहीं घबराते थे। नेहरु जी का यह विचार था कि यह जीवन संग्राम है और संघर्षों से ही जीवन निखरता है , निकम्मे और निठल्ले रहने से जीवन खुद पर बोझ बन जाता है। नेहरु जी का कहना था कि मैं सौ साल तक जीना चाहता हूँ और देखना चाहता हूँ कि जीवन की पगडंडियाँ कितनी उबड-खाबड़ हैं।

वह जीवन इसीलिए नहीं चाहते थे कि सुख-भोग प्राप्त करें। वे जीवन इसलिए नहीं चाहते थे क्योंकि उन्हें वैभव का नशा था, अधिकारों का उन्माद था बल्कि उनके विचार में जीने का अर्थ था जनता की भलाई, संघर्षों से दो हाथ होना और साधना के पथ पर चलना। वह एशिया की एक महान विभूति थे। सारा विश्व उन्हें आदर की दृष्टि से देखता था। नेहरु जी अपने कोट पर गुलाब का फूल लगाया करते थे।

नेहरु जी अपने कोट पर गुलाब का फूल इसलिए लगाते थे क्योंकि उनका मानना था कि जितनी देर जियो मुस्कुराते हुए जियो। अपने सत्कार्यों-सुमनों की महक को बिखेरते हुए जियो। बच्चों के चाचा नेहरु को भुलाया नहीं जा सकता है। नेहरु जी को नन्हे-मुन्ने बच्चों से बहुत प्यार था। इसी वजह से उनका जन्म दिवस बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

नेहरु जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व के सम्मुख उनके विरोधी भी दब जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विदेशी नेता उनकी प्रशंसा और सम्मान करते थे। नेहरु जी ने केवल भारत की राजनीति को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की राजनीति को एक नयी दिशा दी थी। नेहरु जी एक राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक लेखक और वक्ता भी थे। नेहरु जी का लेखकीय व्यक्तित्व भी बहुत प्रभावशाली रहा है।

साहित्यकार : नेहरु जी एक प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ एक सरस साहित्यिक व्यक्ति थे। नेहरु जी ने कारावास में कई रचनाएँ लिखी थी जिसमें उनका साहित्यकार ह्रदय छुपा हुआ है। देश-विदेशों में पढ़ा जाने वाला ‘ डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ‘ नेहरु जी का ही ग्रन्थ है। इसमें भारत का एक प्रतिबिम्ब निहित है।

नेहरु जी की मृत्यु : नेहरु जी ने पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के रिश्तों को सुलझाने की भी कोशिश की मगर वे असफल हो रहे। पाकिस्तान कहता है कि कश्मीर हमारा है और जब चीन से दोस्ती की बात करो तो वो सीमा विवाद आगे कर देते हैं। जिस कारण नेहरु जी ने एक बार चीन से मित्रता के लिए हाथ भी बढ़ाया लेकिन 1962 में चीन ने मोके का फायदा उठाकर धोखे से आक्रमण कर दिया।

नेहरु जी को इस बात का बहुत गहरा झटका लगा। इसी झटके की वजह से नेहरु जी की मृत्यु हुई थी। जवाहर लाल नेहरु जी की मृत्यु 27 मई ,1964 को नई दिल्ली में हार्ट अटैक से हो गई थी। नेहरु जी की आकस्मिक मृत्यु से देश को बहुत आघात पहुँचा था। पुरे देश-विदेश में उनके निधन का शोक छा गया। यद्यपि वे आज हमारे बीच में नहीं है किन्तु उनकी मधुर स्मृति कभी ओझल नहीं हो पाती है।

उपसंहार : नेहरु जी को उनके सभी कार्यों की वजह से सन् 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। नेहरु जी आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाते हैं। भारत के नव-निर्माण में उन्होंने जो भूमिका निभाई उसको भारतवासी सदैव याद रखेंगे। उनका नाम भारत इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा।

भारतीय राजनीति के इतिहास में नेहरु का इतिहास में नेहरु का व्यक्तित्व निर्विवाद रूप से अप्रतिम रहा है। नेहरु जी ने भारत को विश्व के सम्मुख एक उन्नत और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में खड़ा करने में अपूर्व योगदान दिया। नेहरु जी को अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने लोगों से बहुत प्यार था। नेहरु जी के कार्यालय में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू करना उनके मुख्य उद्देश्य रहे हैं।

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