पादप जल संबंध एवं परासरण

पादप जल संबंध एवं परासरण

विसरण

किसी पदार्थ के अणुओं का अपनी उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर गमन करना विसरण कहलाता है। जैसे-

  • अमोनिया की खुली बोतल को किसी कमरे में रखने पर अमोनिया की गंद का पूरे कमरे में फैल जाना,
  • परफ्यूम छिड़कने पर परफ्यूम का पूरे कमरे में फैल जाना,
  • पानी से भरे गिलास में काला रंग डालना डालने पर पानी का रंग काला हो जाना।

किसी एक ही तंत्र (System) में उपस्थित दो या दो से अधिक पदार्थ के अणुओं का विसरण एक-दूसरे पर निर्भर नहीं करता। अर्थात प्रत्येक पदार्थ के विसरण स्वतंत्र रूप से होता है, यह अन्य पदार्थ की उपस्थिति में प्रभावित नहीं होता है। इसे स्वतंत्र विसरण (Independent Diffusion) कहते हैं।

विसरण को प्रभावित करने वाले कारक

तापमान

तापमान बढ़ने के कारण पदार्थ के अणुओं की गतिज ऊर्जा का मान बढ़ता है।, जिससे विसरण की दर बढ़ती है।

पदार्थ का घनत्व

अधिक घनत्व वाली गैस का मिश्रण कम घनत्व वाली गैस की तुलना में मंद होता है। पदार्थ के विसरण की दर उसके घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

क्योंकि घनत्व की दर अधिक होने पर यह अणुओं के मध्य होने वाले स्वतंत्र गति को कम कर देती है।

दाब प्रवणता

पदार्थ हमेशा अपनी अधिक सांद्रता से कम सांद्रता (जिसे सांद्रता प्रवणता भी कहा जाता है) के अनुसार गमन करता है। अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं,कि किसी भी पदार्थ के अणु अधिक विसरण दाब से कम विसरण दाब की ओर गमन करते है।

पारगम्यता

एक विलियन में विलय तथा विलायक दोनों उपस्थित होते हैं तथा यदि कोई परत विलय एवं विलायक दोनों के अणु को गमन के लिए रास्ता प्रदान करती है। तो इस घटना को पारगम्यता कहते हैं।

पारगम्यता के आधार पर परत निम्न प्रकार की होती है-

  1. पूर्ण पारगम्य (Permiable)
  2. अर्ध पारगम्य (Semi-permiable)
  3. चयनात्मक पारगम्य (Seletive Permiable)
  4. अपारगम्य (Non-permiable)

पूर्ण पारगम्य

ऐसी परत जो यह सभी प्रकार के पदार्थों को आर पार जाने देती है। जैसे कोशिका भित्ति।

अर्ध पारगम्य

ऐसी परत जो केवल विलायक के अणुओं को आर पार जाने देती है। लेकिन विलय के अणुओं के लिए अपारगम्य होती है। उदाहरण पार्चमैन झिल्ली, अंडे की झिल्ली आदि।

चयनात्मक पारगम्य

ऐसी झिल्ली जो विलेय तथा विलायक दोनों प्रकार के अणुओं को उनकी प्रकृति के आधार पर चयन करके आर पार जाने देती है। तो चयनात्मक पारगम्य कहलाती है।

अपारगम्य

ऐसी झिल्ली जो ना तो विलय को और ना ही विलायक को आर पार जाने देती है। अपारगम्य कहलाती हैं जैसे क्योंकि क्युटीकल, कोर्क आदि

परासरण

किसी पदार्थ के अणुओं का अपनी अधिक सांद्रता से अपनी कम सांद्रता से ओर अर्ध पारगम्य झिल्ली के माध्यम से होकर जाना परासरण कहलाता है।

विलायक के अणुओं का अपनी अधिक सांद्रता से अपनी कम सांद्रता से ओर अर्ध पारगम्य झिल्ली के माध्यम से होकर जाना परासरण कहलाता है।

जल संबंध एवं परासरण - पादप जल संबंध एवं परासरण
पादप जल संबंध एवं परासरण

यदि किसी पात्र में अर्ध पारगम्य झिल्ली लगाकर उसके एक और शुद्ध पानी तथा दूसरी ओर चीनी के घोल को रखा जाता है। तो पानी के अणु चीनी के घोल की ओर अर्ध पारगम्य झिल्ली से होकर जाने लग जाते हैं, जो परासरण को दर्शाता है।

कोशिकाओं में परासरण दो प्रकार का होता है-

अंतः परासरण

यदि किसी कोशिका को अल्पपरासरणी विलयन में रखा जाता है। तो विलियन से जल कोशिका में प्रवेश करने लगता है।, इसे अंतः परासरण कहते हैं। इससे कोशिका स्फीत हो जाती है।

बाह्य परासरण

यदि किसी कोशिका को अतिपरासरणी विलयन में रखा जाता है। तो परासरण के कारण जल कोशिका से बाहर विलियन की ओर गमन करने लगता है।, जिससे कोशिका संकुचित हो जाती है।

परासरणता

परासरणता के आधार पर विलयन तीन प्रकार का होता है-

  1. अल्पपरासरणी विलयन (Hypotonic Solution)
  2. समपरासरणी विलयन (Isotonic Solution)
  3. अतिपरासरणी विलयन (Hypertonic Solution)

अल्पपरासरणी विलयन

यदि किसी विलयन में विलेय की सांद्रता कोशिका की तुलना में कम होती है। तो अल्पपरासरणी विलयन कहते है।

यदि किसी कोशिका को अल्पपरासरणी विलयन में रखते हैं तो विलयन से पानी कोशिका में प्रवेश कर जाता है। जिससे कोशिका फूल जाती है। ऐसी कोशिका को स्फीत कोशिका (Turgid Cell) कहते है।

पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति कोशिका को फटने से बचाने में मदद करती है। हालांकि, जन्तु कोशिका स्फीत होती रहती है, और अन्त में फट जाती है।

समपरासरणी विलयन 

यदि किसी विलयन में विलय की सांद्रता कोशिका के समान होती है। तो इसे समपरासरणी विलयन कहते है। इस अवस्था में कोई सांद्रता प्रवणता नहीं होती है। इसलिए पानी के अणु कोशिका में स्वतंत्र रूप से अंदर और बाहर जाते हैं, और गति की दर दोनों दिशाओं में समान है। इसे श्लथ कोशिका (Flaccid Cell) कहते है।

अतिपरासरणी विलयन

यदि किसी विलयन में विलय की सांद्रता कोशिका की तुलना में अधिक होती है। तो उसे अतिपरासरणी विलयन कहते है।
यदि किसी कोशिका को अतिपरासरणी विलयन में रखा जाता है, तो कोशिका से पानी बाहर विलयन में आ जाता है। जिससे कोशिका संकुचित हो जाती है।

जीवद्रव्य कुंचन

यदि किसी कोशिका को अतिपरासरणी विलयन में रखा जाता है। तो परासरण के कारण जल कोशिका से बाहर विलियन की ओर गमन करने लगता है। जिससे कोशिका संकुचित हो जाती है उसका जीवद्रव्य सिकुड़कर एक कोने में एकत्र हो जाता है इसे जीवद्रव्य कुंचन (Plasmolysis) कहते है।

परासरण दाब

जब किसी पदार्थ के अणु परासरण के कारण गमन करते हैं, तो वह दाब जो परासरण का विरोध करता है, परासरण दाब कहलाता है।

अर्ध पारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक विलयन में परासरण होता है, तो वह दाब जिसको लगाकर परासरण को रोका जा सकता है, परासरण दाब कहलाता है। जल हमेशा कम परासरण दाब से अधिक परासरण दाब की ओर गमन करता है।

शुद्ध जल का परासरण दाब शुन्य होता है।
पतियों का परासरण दाब सबसे अधिक तथा जड़ों का परासरण दाब सबसे कम होता है।
लवणोद्भिद पादपों (Halophyte) का परासरण दाब सबसे अधिक एवं जलोद्भिद पादपों (Hydrophyte) का परासरण दाब सबसे कम होता है।
परासरण दाब का मान दोपहर में सर्वाधिक और रात्रि के समय सबसे कम होता है।
विलयन में विलय पदार्थों की सांद्रता जितनी अधिक होती है। उस विलयन का परासरण दाब उतना ही अधिक होता है।

स्फीति दाब

जब किसी कोशिका को अल्पपरासरी विलयन में रखा जाता है। तो पानी कोशिका में प्रवेश करने लगता है। जिसके कारण कोशिका भित्ति पर एक दाब लगता है, इसे स्फीति दाब कहते है। यह केंद्र से बाहर की ओर अर्थात अपकेंद्रीय होता है।

श्लथ कोशिका का स्फीति दाब शून्य होता है।
स्फीत कोशिका का स्फीति दाब परासरण दाब के बराबर होता है।
जीव द्रव्य कुंचित कोशिका (Plasmolysed Cell) का स्फीति दाब ऋणात्मक होता है।

भित्ति दाब

जब कोशिका में स्फीति दाब लगता है। तो कोशिका भित्ति दृढ़ होने के कारण यह कोशिका में अंदर की ओर एक दबाव लगाती है, जिसे भित्ति दाब कहते हैं। यह अभिकेंद्रीय होता है, अर्थात यह बाहर से केंद्र की ओर लगता है।
भित्ति दाब का मान स्फीति दाब के सम्मान परंतु ऋणात्मक होता है।

कोशिका भित्ति के कारण पादप कोशिका को शुद्ध जल में रखने पर यह फटती नहीं है। लेकिन जंतु कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होने के कारण इसे शुद्ध जल में रखने पर यह फट जाती है।

विसरण दाब न्यूनता

जब किसी भी विलायक में विलेय मिलाया जाता है। तो विलायक के विसरण दाब में आई कमी को विसरण दाब न्यूनता कहते है। इसे चूषण दाब या कोशिका की पानी की मांग भी कहते है।

जल हमेशा कम विसरण दाब न्यूनता (DPD) से अधिक विसरण दाब न्यूनता (DPD) की ओर गमन करता है।

विसरण दाब न्यूनता, परासरण दाब तथा स्फीति दाब में निम्न सम्बन्ध होता है-

DPD = OP-TP

विभिन्न स्थितियों में विसरण दाब न्यूनता

(A) जब कोशिका स्फीत हो-

जब कोशिका में पानी प्रवेश करता है। तो स्फीति दाब का मान बढ़ने लग जाता है। और इसका मान परासरण दाब के बराबर हो जाता है। स्फीत कोशिका का स्फीति दाब परासरण दाब के बराबर होता है।

OP = TP
DPD = OP-TP
DPD = OP – OP
DPD = 0

(B) जब कोशिका श्लथ हो

श्लथ कोशिका में स्फीति दाब का मान शुन्य होता है।

TP = 0
DPD = OP-TP
DPD = OP

विसरण दाब न्यूनता का मान परासरण दाब के समान होता है।

(C) जब कोशिका जीवद्रव्य कुंचित हो

जीवद्रव्य कुंचित कोशिका में स्फीति दाब का मान ऋणात्मक होता है।

TP = –
DPD = OP-(-TP)
DPD = OP+TP

अतः विसरण दाब न्यूनता का मान परासरण दाब से भी अधिक होता है, इसलिए कह सकते हैं कि जीवित कोशिका में जल की मांग सर्वाधिक होती है।

स्वतंत्र ऊर्जा अभिधारणा एवं पादप जल सम्बन्ध

जल विभव

जल के अणु स्वतंत्र रूप से गति करते हैं उनके अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। जब जल में कोई विलेय मिला दिया जाता है, तो उसके स्वतंत्र ऊर्जा के मान में कमी आती है। यह कमी जल विभव कहलाती है। इसे Ψw से दर्शाते है।
इसकी परिकल्पना टेयलर तथा स्लेटयर ने दी।
शुद्ध जल का जल विभव अधिकतम होता है। यदि इसमें कोई विलेय मिला दिया जाता है, तो इसके जल विभव में कमी आती है। अतः विलयन का जल विभव ऋणात्मक होता है।
जल विभव विसरण दाब न्यूनता के समान ही होता है। परंतु इसका मान ऋण आत्मक होता है।
जल हमेशा उच्च जल विभव से निम्न जल विभव की ओर गमन करता है।

परासरण विभव 

स्वतंत्र ऊर्जा अवधारणा के अनुसार परासरण दाब को परासरण विभव या विलेय विभव (Solute Potential) कहलाता है। इसका मान ऋणात्मक होता है। इसे Ψs से दर्शाते है।

दाब विभव 

स्वतंत्र ऊर्जा अवधारणा के अनुसार स्फीति दाब को दाब विभव से व्यक्त किया जाता है। इसका मान धनात्मक होता है। इसे Ψp से दर्शाते है।

Ψw= Ψs+ Ψp

अंतः शोषण 

किसी ठोस पदार्थ के द्वारा उज्जल के अधिशोषण को अंतः शोषण या अन्तः चुषण कहते है।
जैसे वर्षा ऋतू में लकड़ी के दरवाजों का फूल जाना। बीजों को पानी में रखने पर फूलना।