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विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

चुम्बक के ध्रुव (The poles of Magnet):
1. उत्तर दिशा की ओर संकेत करने वाले सिरे को उत्तरोमुखी ध्रुव अथवा उत्तर ध्रुव कहते हैं।
2. दूसरा सिरा जो दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है उसे दक्षिणोमुखी ध्रुव अथवा दक्षिण ध्रुव कहते हैं।
चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Field): एक मैगनेट के चारों के क्षेत्र जिसमें चुम्बक का पता लगाया जा सकता है, चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है |



चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ (Magnetic Field Lines): चुम्बक के चारों ओर बहुत सी रेखाएँ बनती हैं, जो चुम्बक के उतारी ध्रुव से निकल कर दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती प्रतीत होती हैं, इन रेखाओं को चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ कहते हैं |
चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की विशेषताएँ (Features of Magnetic Field Lines): 
(i) चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव में समाहित हो जाती है |
(ii) चुम्बक के अंदर, चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा इसके दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होता है |
(iii) चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ बंद वक्र होती हैं |
(iv) जहाँ चुम्बकीय क्षेत्र रेखाए घनी होती हैं वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र मजबूत होता है |
(v) दो चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ कभी एक दुसरे को प्रतिच्छेद नहीं करती हैं |



धारावाही चालक के चारो ओर चुम्बकीय क्षेत्र :
(Magnetic Fields around the current carrying conductor: 
(i) एक धातु चालक से होकर गुजरने वाली विद्युत धारा इसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र बनाता है |
(ii) जब एक धारावाही चालक को दिक्सूचक सुई के पास और उसके सुई के समांतर ले जाते है तो  विद्युत धारा की बहाव की दिशा दिकसुचक के विचलन की दिशा को उत्क्रमित कर देता है जो कि विपरीत दिशा में होता है |
(iii) यदि धारा में वृद्धि की जाती है तो दिक्सूचक के विचलन में भी वृद्धि होती हैं |
(iv) जैसे जैसे चालन में धारा की वृद्धि होती है वैसे वैसे दिए गए बिंदु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण भी बढ़ता है |
(v) जब हम एक कंपास (दिक्सूचक) को धारावाही चालक से दूर ले जाते हैं तो सुई का विचलन कम हो जाता है |
(vi) तार में प्रवाहित विद्युत धारा के परिमाण में वृद्धि होती है तो किसी दिए गए बिंदु पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र के परिमाण में भी वृद्धि हो जाती है।
(vii) किसी चालक से प्रवाहित की गई विद्युत धरा के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र चालक से दूर जाने पर घटता है।
(viii) जैसे-जैसे विद्युत धरावाही सीधे चालक तार से दूर हटते जाते हैं, उसके चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र को निरूपित करने वाले संकेंद्री वृत्तों का साइज़ बड़ा हो जाता है।



दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम (Right hand thumb Rule): 
कल्पना कीजिए कि आप अपने दाहिने हाथ में विद्युत धरावाही चालक को इस प्रकार पकड़े हुए हैं कि आपका अँगूठा विद्युत धरा की दिशा की ओर संकेत करता है, तो आपकी अँगुलियाँ चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाओं की दिशा में लिपटी होंगी | इस नियम को दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम कहते हैं |
इस नियम को मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू नियम भी कहते हैं |

विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश के कारण चुंबकीय क्षेत्र :
Magnetic Field due to a Current through a Circular Loop:
किसी विद्युत धरावाही चालक के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र उससे दूरी के व्युत्क्रम पर निर्भर करता है। इसी प्रकार किसी विद्युत धरावाही पाश के प्रत्येक बिंदु पर उसके चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत&22381;र को निरूपित करने वाले संकेंद्री वृत्तों का साइज़ तार से दूर जाने पर निरंतर बड़ा होता जाता है ।
विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश के कारण चुंबकीय क्षेत्र का गुण:
Properties of magnetic field line of a current through a circular loop: 
(i) वृत्ताकार पाश के केंद्र पर इन बृहत् वृत्तों के चाप सरल रेखाओं जैसे प्रतीत होने लगते हैं।
(ii) विद्युत धरावाही तार के प्रत्येक बिंदु से उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ पाश के केंद्र पर सरल रेखा जैसी प्रतीत होने लगती हैं।
(iii) पाश के भीतर सभी चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक ही दिशा में होती हैं।                               

  • किसी विद्युत धरावाही तार के कारण किसी दिए गए बिंदु पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र प्रवाहित विद्युत धरा पर अनुलोमतः निर्भर करता है।
  • यदि हमारे पास n फेरों की कोई कुंडली हो तो उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र परिमाण में एकल फेरों द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में n गुना अधिक प्रबल होगा। इसका कारण यह है कि प्रत्येक फेरों में विद्युत धारा के प्रवाह की दिशा समान है, अतः व्यष्टिगत फेरों के चुंबकीय क्षेत्र संयोजित हो जाते हैं।

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परिनालिका (Solenoid): पास-पास लिपटे विद्युतरोधी ताँबे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं।
परिनालिका में प्रवाहित विद्युत धारा के कारण चुम्बकीय क्षेत्र :
Magnetic Field due to a Current in a Solenoid: 
जब विद्युत धारा किसी परिनालिका से होकर गुजरती है | तो इसका एक सिरा चुम्बक के उतरी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है जबकि दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है |

परिनालिका के भीतर और उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाओं का गुण :
Properties of the field lines inside the solenoid: 

  • परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समांतर सरल रेखाओं की भाँति होती हैं।
  • यह निर्दिष्ट करता है कि किसी परिनालिका के भीतर सभी बिंदुओं पर चुंबकीय क्षेत्र समान होता है। अर्थात परिनालिका के भीतर एकसमान चुंबकीय क्षेत्र होता है।
  • परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समांतर सरल रेखाओं की भाँति होती हैं। परिनालिका के चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के इस गुण का उपयोग विद्युत चुम्बक बनाने में किया जाता है |
  • परिनालिका के भीतर एक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है |

विद्युत चुम्बक (Electromagnet) : परिनालिका के भीतर उत्पन्न प्रबल चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग किसी चुंबकीय पदार्थ, जैसे नर्म लोहे, को परिनालिका के भीतर रखकर चुंबक बनाने में किया जाता है । इस प्रकार बने चुंबक को विद्युत चुंबक कहते हैं।
विद्युत चुंबक का गुण (Some properties of electromagnet) : 
1. समान्यत: इसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र अधिक प्रबल होता है |
2. चुम्बकीय क्षेत्र की ताकत को परिनालिका में फेरों की संख्या और विद्युत धारा जैसे नियंत्रण करने वाली विभिन्न कारकों के द्वारा नियंत्रित की जा सकती है |
3. परिनालिका से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का ध्रुवत्व प्रवाहित विद्युत की दिशा में परिवर्तन कर उत्क्रमित किया जा सकता है |
विद्युत चुंबक और स्थायी चुंबक में अंतर :


Differences between electromagnet and parmanent magnet: 

 विद्युत चुंबक   स्थायी चुंबक
1. विद्युत चुंबक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र समान्यत: अधिक प्रबल होता है | 1. समान्यत: इसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र कम प्रबल होता है |
2. चुम्बकीय क्षेत्र की ताकत को परिनालिका में फेरों की संख्या और विद्युत धारा जैसे नियंत्रण करने वाली विभिन्न कारकों के द्वारा नियंत्रित की जा सकती है | 2. स्थायी चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत स्थायी होता है, परन्तु तापमान में परिवर्तन कर इसे कम किया जा सकता है |
3. इसकी ध्रुवता धारा में परिवर्तन कर उत्क्रमित किया जा सकता है | 3. इसकी ध्रुव में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है |
4. विद्युत चुंबक बनाने के लिए समान्यत: मृदु लोहे का उपयोग किया जाता है |  4. इस उदेश्य लिए कोबाल्ट या स्टील का प्रयोग किया जाता है | 

FORCE ON A CURRENT-CARRYING CONDUCTOR IN A MAGNETIC FIELD:
एक प्रबल नाल चुंबक इस प्रकार से व्यवस्थित कीजिए कि छड़ नाल चुंबक के दो ध्रुवों के बीच में हो तथा चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा उपरिमुखी हो। ऐसा करने के लिए नाल चुंबक का उत्तर ध्रुव ऐलुमिनियम की छड़ के ऊर्ध्वाधरतः नीचे हो एवं दक्षिण ध्रुव ऊर्ध्वाधरतः ऊपर हो । जब विद्युत धारा एल्युमीनियम छड के सिरा B से सिरा A तक होकर गुजरता है तो ऐसा देखा जाता है कि छड विस्थापित होता है | ऐसा भी देखा जाता है कि जब धारा की दिशा को परिवर्तित किया जाता है तो छड की विस्थापन की दिशा भी बदल (उत्क्रमित हो) जाती है |




निष्कर्ष (Conclusion) : 
(i) A magnetic field exerts a force on a magnet placed in the vicinity of the conductor.
(ii) A force is exerted on the current-carrying aluminium rod when it is placed
in a magnetic field.
(iii) The direction of force is also reversed when the direction of current through the conductor is reversed.
(iv) The direction of force acting on the current-carrying rod gets reversed when
the direction of current is reversed.
(v) The force on the conductor depends upon the direction of current and the direction of the magnetic field.
The force on the conductor:
The force on the conductor depends upon the flowing two things:
(i) The direction of current and
(ii) The direction of the magnetic field.



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