राजस्थान के लोक संगीत

राजस्थान-के-लोक-संगीत

राजस्थान के लोक संगीत

1. झोरावा गीत

जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो पत्नी अपने पति के वियोग में गाती है।

2. सुवटिया

उत्तरी मेवाड़ में भील जाति की स्त्रियां पति -वियोग में तोते (सूए) को संबोधित करते हुए यह गीत गाती है।

3. पीपली गीत

मारवाड़ बीकानेर तथा शेखावटी क्षेत्र में वर्षा ऋतु के समय स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।

4. सेंजा गीत

यह एक विवाह गीत है, जो अच्छे वर की कामना हेतु महिलाओं द्वारा गया जाता है।

5. कुरजां गीत

यह लोकप्रिय गीत में कुरजां पक्षी को संबोधित करते हुए विरहणियों द्वारा अपने प्रियतम की याद में गाया जाता है, जिसमें नायिका अपने परदेश स्थित पति के लिए कुरजां को सन्देश देने का कहती है।

6. जकडि़या गीत

पीरों की प्रशंसा में गाए जाने वाले गीत जकडि़या गीत कहलाते है।

7. पपीहा गीत

पपीहा पक्षी को सम्बोधित करते हुए गया गया गीत है। जिसमें प्रेमिका अपने प्रेमी को उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।

8. कागा गीत

कौवे का घर की छत पर आना मेहमान आने का शगुन माना जाता है। कौवे को संबोधित करके प्रेयसी अपने प्रिय के आने का शगुन मानती है और कौवे को लालच देकर उड़ने की कहती है।

9. कांगसियों

यह राजस्थान का एक लोकप्रिय श्रृंगारिक गीत है।

10. हमसीढो

भील स्त्री तथा पुरूष दोनों द्वारा सम्मिलित रूप से मांगलिक अवसरों पर गाया जाने वाला गीत है।

11. हरजस

यह भक्ति गीत है, हरजस का अर्थ है हरि का यश अर्थात हरजस भगवान राम व श्रीकृष्ण की भक्ति में गाए जाने वाले भक्ति गीत है।

12. हिचकी गीत

मेवात क्षेत्र अथवा अलवर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत दाम्पत्य प्रेम से परिपूर्ण जिसमें प्रियतम की याद को दर्शाया जाता है।

13. जलो और जलाल

विवाह के समय वधु पक्ष की स्त्रियां जब वर की बारात का डेरा देखने आती है तब यह गीत गाती है।

14. दुप्पटा गीत

विवाह के समय दुल्हे की सालियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।

15. कामण

कामण का अर्थ है – जादू-टोना। पति को अन्य स्त्री के जादू-टोने से बचाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है।

16. पावणा

विवाह के पश्चात् दामाद के ससुराल जाने पर भोजन के समय अथवा भोजन के उपरान्त स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।

17. सिठणें

विवाह के समय स्त्रियां हंसी-मजाक के उद्देश्य से समधी और उसके अन्य सम्बन्धियों को संबोधित करते हुए गाती है।

18. मोरिया गीत

इस लोकगीत में ऐसी बालिका की व्यथा है, जिसका संबंध तो तय हो चुका है लेकिन विवाह में देरी है।

19. जीरो

जालौर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। इस गीत में स्त्री अपने पति से जीरा न बोने की विनती करती है।

20. बिच्छुड़ो

हाडौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जिसमें एक स्त्री जिसे बिच्छु ने काट लिया है और वह मरने वाली है, वह पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है।

21. पंछीडा गीत

हाडौती तथा ढूढाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो त्यौहारों तथा मेलों के समय गाया जाता है।

22. रसिया गीत

रसिया होली के अवसर पर ब्रज, भरतपुर व धौलपुर क्षेत्रों के अलावा नाथद्वारा के श्रीनाथजी के मंदिर में गए जाने वाले गीत है।

23. घूमर

णगौर अथवा तीज त्यौहारों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा घूमर नृत्य के साथ गाया जाने वाला गीत है, जिसके माध्यम से नायिका अपने प्रियतम से श्रृंगारिक साधनों की मांग करती है।

24. औल्यूं गीत

ओल्यू का मतलब ‘याद आना’ है।बेटी की विदाई के समयय गाया जाने वाला गीत है।

25. लांगुरिया

करौली की कैला देवी की अराधना में गाये जाने वाले भक्तिगीत लांगुरिया कहलाते है।

26. गोरबंध

गोरबंध, ऊंट के गले का आभूषण है। मारवाड़ तथा शेखावटी क्षेत्र में इस आभूषण पर गीत गाया जाता है।

27. चिरमी

चिरमी के पौधे को सम्बोधित कर बाल ग्राम वधू द्वारा अपने भाई व पिता की प्रतिक्षा के समय की मनोदशा का वर्णन है।

28. पणिहारी

इस लोकगीत में राजस्थानी स्त्री का पतिव्रता धर्म पर अटल रहना बताया गया है।

29. इडुणी

यह गीत पानी भरने जाते समय स्त्रियों द्वारा गाया जाता है। इसमें इडुणी के खो जाने का जिक्र होता है।

30. केसरिया बालम

यह एक प्रकार का विरह युक्त रजवाड़ी गीत है जिसे स्त्री विदेश गए हुए अपने पति की याद में गाती है।

31. धुडला गीत

मारवाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है, जो स्त्रियों द्वारा घुड़ला पर्व पर गाया जाता है।

32. लावणी गीत(मोरध्वज, सेऊसंमन- प्रसिद्ध लावणियां)

लावणी से अभिप्राय बुलावे से है। नायक द्वारा नायिका को बुलाने के सन्दर्भ में लावणी गाई जाती है।

33. मूमल

जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत, जिसमें लोद्रवा की राजकुमारी मूमल का सौन्दर्य वर्णन किया गया है। यह एक श्रृंगारिक गीत है।

34. ढोला-मारू

सिरोही क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो ढोला-मारू के प्रेम-प्रसंग पर आधारित है, तथा इसे ढाढ़ी गाते है।

35. हिण्डोल्या गीत

श्रावण मास में राजस्थानी स्त्रियां झुला-झुलते समय यह गीत गाती है।

36. जच्चा गीत

बालक के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला गीत है इसे होलरगीत भी कहते है।

राजस्थानके प्रमुख लोक गीत

लोक गीत – किसी विशेष जनसमुदाय  द्वारा गाये जाने वाले गीत को ही लोकगीत कहते हैं। ये समुदाय की धरोहर होती है। लोक गीतों के माध्यम से  देश की संस्कृति एक नई जान मिलती हैं । त्योहारों एवं उत्सवों के साथ लोकगीतों का अटूट संबंध है।
राजस्थान के प्रमुख लोकगीत निम्न प्रकार हैं :-
  • मूमल लोकगीत – यह लोद्रवा की राजकुमारी मूमल पर आधारित जैसलमेर में गाया जाने वाला शृंगारिक लोकगीत है, जिसमें मूमल का नखशिख (श्रृंगार गीत) वर्णन किया गया है। यह गीत इस प्रकार हैं: – “म्हारी वरसाले री मूमल, हालैनी ऐ आलीजे रे देख।”
  • ढोलामारु – यह राजस्थान के सिरोही क्षेत्र का लोकगीत है। इस लोकगीत को ढाढी लोग गाते हैं । यह प्रेम एवं श्रृंगार रस का गीत है। इसमें ढोलामारु की प्रेमकथा का वर्णन है।
  • गोरबंद – गोरबंद ऊँट के गले का एक आभूषण होता है, जिस पर राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों विशेषत: मारवाड़ व शेखावाटी क्षेत्रों में लोकप्रिय ‘गोरबंद’ गीत प्रचलित है, जिसके बोल हैं :- “म्हारो गोरबंद नखरालो।”
  • कुरजां – कुरजाँ राजस्थानी लोकजीवन में पत्नी द्वारा अपने पति को संदेश भिजवाने हेतु कुरजाँ पक्षी को माध्यम बनाकर गाया जाता है। यह मांड गायन शैली में गाया जाने वाला विरह गीत है। इस गीत के बोल निम्न प्रकार है : – “कूजाँ ए म्हारौ भँवर मिलाद्यो ए।”
  • तेजा गीत – यह किसानों का यह प्रेरक गीत है, जो खेती शुरु करते समय तेजाजी की भक्ति में गाया जाता है।
  • घूमर – यह गणगौर के अवसर मारवाड़ एवं शेखावाटी क्षेत्र में किया जाने घूमर नृत्य के साथ गाया जाता है। यह गणगौर के त्यौहार पर मुख्य रूप से गाया जाता है, इस गीत के बोल निम्न हैं:- “म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ, घूमर रमवा म्हैं जास्याँ।”
  • ओल्यू – ओल्यूँ एक यादगीत है, जो किसी की याद में गाई जाती है, जैसे बेटी की विदाई पर उसके घर की स्त्रियाँ इसे गाती हैं। विवाह के अवसर पर यह गीत महिलाओं द्वारा गाया जाता है, जबकि गीदड़ नृत्य के अवसर पर यह पुरुषों द्वारा गाया जाता है।  इस लोकगीत के बोल निम्न प्रकार हैं:- “कँवर बाई री ओल्यूँ आवै ओ राज।”
  • काजलियो – काजलियो एक शृंगारिक गीत है, जो विशेषकर होली एवं विवाह के अवसर पर चंग पर गाया-बजाया जाता है। निकासी के समय भोजाई द्वारा वर की आँखों में काजल निकलने की रस्म पर गाया जाता है।
  • पावणा – नए दामाद के ससुराल आगमन पर भोजन कराते समय स्त्रियों द्वारा ‘पावणा’ गीत गाए जाते हैं।
  • कामण – राजस्थान में वर को जादू-टोने से बचाने के लिए विवाह के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत ‘कामण’ कहलाते हैं।
  • रातीजगा – पुत्र जन्मोत्सव, विवाह, मुंडन आदि शुभ अवसरों पर अथवा मनौती मनाने पर रात भर जाग कर किसी देवता के गाए जाने वाले गीत ‘रातीजगा’ कहलाते हैं।
  • पणिहारी, इण्डोणी – यह गीत महिलाओं द्वारा पानी भरते समय गया जाता है। यह राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत है, इस गीत पणिहारी के माध्यम से राजस्थानी स्त्री का पतिव्रत धर्म पर अटल रहना बताया गया है। इण्डोणी गीत के बोल निम्न है :- “म्हारी सवा लाख री लूम, गम गई इंडोणी।”
  • कांगसियो – यह गीत पश्चिमी राजस्थान में गाया जाता है। इस गीत के बोल निम्न है :-“म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियाँ ले गई रे।”
  • झोरावा – यह पति के परदेस जाने पर उसके वियोग में गाया जाने वाला गीत हैं। यह मुख्यत: जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाता है।
  • सुवटिया – भीलनी स्त्री द्वारा परदेस गए अपने पति को इस गीत के माध्यम से संदेश भेजा जाता है।
  • दुपट्टा – यह गीत शादी के अवसर पर दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाता है।
  • हमसीढों – यह उत्तरी मेवाड़ में भीलों का प्रसिद्ध लोकगीत है। इसे स्त्री और पुरुष युगल में गाते हैं।
  • हिचकी – हिचकी गीत अलवर (मेवात) क्षेत्र का प्रसिद्ध गीत है। यह महिलाओं द्वारा गाया जाता है। इस गीत के बोल निम्न है :- “म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी।”
  • पपैयो –  पपैयो गीत पपीहा पक्षी पर गाया जाता है। यह दाम्पत्य प्रेम के आदर्श का प्रतीक है। इसमें वर्षा ऋतु में पत्नी अपने पति से उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।
  • हरजस – राजस्थानी महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले वे सगुणभक्ति लोकगीत, जिनमें राम एवं कृष्ण दोनों की लीलाओं का वर्णन है।
  • जलो और जलाल – यह गीत वर की बारात को जब वधू के परिवार की महिलाऐं देखने जाती है, उस समय गाती है। इस गीत के बोल निम्न हैं:- “म्हें तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जळा।”
  • रसिया – ब्रज, भरतपुर, धौलपुर आदि क्षेत्रों में गाए जाने वाले गीत।  इस गीत के बोल निम्न है :- “माखन की चोरी छोड़ कन्हैया मैं समझाऊँ तोय” |
  • लावणी – लावणी का मतलब बुलाने से है। नायक के द्वारा नायिका को बुलाने के लिए श्रृंगार एवं भक्ति सम्बंधित प्रसिद्ध लावणियाँ गायी जाती है, जो मुख्यत: मोरध्वज, सेऊसंमन्, भरथरी आदि हैं।
  • सीठणे – इन्हें ‘गाली’ गीत भी कहते हैं। ये विवाह समारोह में ‘ख़ुशी एवं हंसी ठिठोली में गाये जाने वाले गाली गीत है।
  • लांगुरिया – यह गीत करौली क्षेत्र की कुल देवी ‘ कैला देवी’ के मेले पर कैला देवी की याद में गाया जाता है। इस गीत के बोल निम्न है :- “कैला मैया के भवन में डूडवन खेले लांगुरियां” |
  • हीडो –  श्रावण मास में राजस्थानी महिलाएँ झूला झूलते समय हिण्डो गीत गाती हैं । इस गीत के बोल निम्न हैं :- “सावणियै रौ हीडौ रे बाँधन जाय।”
  • बिछुड़ों –  यह हाड़ौती क्षेत्र का एक लोकप्रिय गीत है, जिसमें बिच्छू के डांक से मरणासन्न एक पत्नी अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है। इस गीत के बोल निम्न है :- “मैं तो मरी होती राज, खा गयो बैरी बीछूड़ो।”
  • बधावागीत – यह शुभ कार्य सम्पन्न होने पर गाया जाने वाला मंगल गीत है।
  • सुपणा – यह गीत विरहणी के स्वप्न से सम्बन्धित है। इस गीत के बोल निम्न हैं- “सूती थी रंगमहल में, सूता में आयो रे जंजाळ, सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी।”
  • जच्चा – यह बच्चे के जन्म दिन गाया जाने वाले गीत हैं।
  • घोड़ी – यह लड़के के विवाह पर वर निकासी के समय महिलाओं द्वारा घुड़चढ़ी की रस्म में गाया जाने वाले गीत। इस गीत के बोल निम्न है :- “घोड़ी म्हारी चंद्रमुखी सी, इंद्रलोक सूँ आई ओ राज।”
  • बनाबनी – यह गीत विवाह के अवसर पर गाया जाता है।
  • कागा – इसमें विरहणी नायिका कौए को संबोधित करके अपने पिवजी के आने का शगुन मनाती है। इस गीत के बोल निम्न है :- “उड-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला, जद म्हारा पिवजी घर आवै।”
  • गणगौर का गीत – गणगौर पर स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला प्रसिद्ध लोकगीत है। इस गीत के बोल निम्न हैं:- “खेलन द्यो गणगौर, भँवर म्हानै खेलन द्यो गणगौर।”
  • पीपली – यह विशेषत: शेखावाटी, बीकानेर तथा मारवाड़ के कछ भागों में महिलाओं द्वारा तीज एवं वर्षा ऋतु में गाय जाने वाला विरह लोकगीत है। इस गीत के माध्यम से पत्नी अपने परदेसी पति को बुलाती है।
  • घुड़ला – जोधपुर (मारवाड़) क्षेत्र में होली के बाद घुड़ला त्यौहार के अवसर पर लड़कियों द्वारा सामूहिक रूप से गाये जाने वाला लोकगीत है। इस गीत के बोल निम्न है :- “धुडळो घूमेला जी घूमेला, घुड़ले रे बाँध्यो सूत।”
  • पंछीडा – हाड़ाती व ढूँढाड़ क्षेत्र में मेलों के अवसर पर अलगोजा, मंजीरों एवं ढोलक के साथ सामूहिक रूप से गाया जाने वाला लोक गीत है।
  • केसरिया बालम – यह एक विरह एवं रजवाड़ी गीत है। यह महिलाओं द्वारा गाया जाता है।
  • जीरो – इस गीत के माध्यम से गांव की एक नारी अपने पति से जीरा की फसल नहीं बोने की विनती करती है। इस गीत के बोल हैं: “यो जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।”
  • चिरमी – इस लोक गीत में चिरमी के पौधे को संबोधित कर एक नववधू द्वारा अपने भाई व पिता की प्रतीक्षा के समय की मनोदशा का चित्रण है। इस गीत के बोल निम्न है :- “चिरमी रा डाला चार” | 
  • हालरिया – यह गीत जैसलमेर क्षेत्र में बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाता है।
  • राजस्थान के अन्य लोकगीत – रतनराणों, घूघरी, केवड़ा, बिणजारा, लालर, बिछियो, कूकड़ी, जला, लोटिया आदि।

राजस्थानी लोकगीतों के प्रकाशित संग्रह

  • खेताराम माली – मारवाड़ी गीत संग्रह 
  • सरदारमल थानवी – मरूधर गीत माला व घुड़ले के 9 गीत
  • विद्याधरी देवी – असली मारवाड़ी गीत संग्रह 
  • विद्वान्त्रय – राजस्थान के लोकगीत 
  • मेहता रघुनाथ सिंह – जैसलमेरिया संगीत रत्नाकार 
  • जगदीश सिंह गहलोत – मारवाड़ के ग्राम गीत 
  • सूर्यकरण पारीक – राजस्थान के लोकगीत 
  • पुरूषोतम लाल मेनारिया – राजस्थानी लोकगीत
  • अमृतलाल माथुर – रामरस 
  • बलदेव पुरोहित – जैसलमेर संगीत सुधा
  • बैजनाथ केडिया – मारवाड़ी गीत संग्रह 
  • रामनरेश त्रिपाठी – मारवाड़ के मनोहर गीत 

मांड: यह सबसे लोकप्रिय राजस्थानी लोक संगीत है जो शाही दरबारों में विकसित हुआ था और स्थानीय संगीतकार इसे बजाते हैं। संगीतकारों द्वारा पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं और लोक गायक तेजाजी, गोगाजी और रामदेवजी जैसे राजपूत शासकों की महिमा और प्रशंसा गाते हैं।

पनिहारी: इस लोक संगीत को महिलाओं द्वारा गाया जाता है और इनमें से अधिकांश गीतों की थीम पानी की कमी और गाँव के पास की गाँव की महिलाओं के उनके दैनिक काम पर आधारित है। इनमें से कुछ पनिहारी लोक गीत प्रेमियों के साथ संयोग से हुए हैं और कुछ सास और बहू के संबंधों पर आधारित हैं।

भजन: यह संगीत भगवान कृष्ण की शाही विरासत और दिव्यता दोनों को एक आदर्श मिश्रण में मिलाता है, क्योंकि विभिन्न कृष्ण भजनों को खुद मीराबाई ने कलमबद्ध किया है। इन बेहद लोकप्रिय गीतों ने संगीत की एक नई पाठशाला बनाई है और दुनिया के हर कृष्ण प्रेमियों तक पहुंची है।

राजस्थान, उत्तर भारत की लोक कलाओं और संगीत परंपराओं को स्थानीय मनोरंजनकर्ताओं जैसे ढोली, लंगास, मिरासिस और मंगानियार द्वारा जीवित रखा जाता है। लोक संगीतकार शास्त्रीय परंपरा में उपयुक्त हैं। गीतों की शुरुआत सामान्य रूप से एक आलाप के साथ होती है, जिसमें गीत की धुन निर्धारित होती है और फिर दोहे का पाठ होता हैराजस्थानी संगीत में बजाए जाने वाले विशिष्ट वाद्ययंत्र इस प्रकार हैं:

शहनाई: शहनाई विवाह और त्योहारों के समय राजस्थान में व्यापक रूप से बजाई जाती है। इसमें एक एकल लकड़ी की ट्यूब होती है जिसमें कई छेद होते हैं, और सबसे ऊपर इसमें एक धातु का मुखपत्र होता है, जिसके माध्यम से इसे बजाया जा सकता है।

मोरचांग: मोरचांग एक लोहे का एक यंत्र है, जैसे यहूदी वीणा, जो कि मधुर ध्वनि उत्पन्न करता है। यह राजस्थान के लंगा समुदाय के लिए सबसे पसंदीदा साधन है। यह उपकरण विभिन्न प्रकार के नोट्स तैयार करता है और लयबद्ध पैटर्न की एक बड़ी श्रृंखला बुनता है।

खरताल: खरताल एक भक्ति वाद्य है, जिसका उपयोग धार्मिक गायन के समय किया जाता है। इसमें समतल आयताकार लकड़ी के क्लैपर्स की एक जोड़ी होती है, जिसमें पतले पीतल के जिंगल लगे होते हैं। यह एक अंगूठी को अंगूठे में बांधकर बजाया जाता है, जबकि बाकी के चार अंगुलियों को पकड़कर रखा जाता है, जो एक दूसरे के खिलाफ ताली बजाने पर मंत्रमुग्ध होकर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।

चांग: इस वाद्य का उपयोग कामुक गीतों की लयबद्ध संगत के रूप में किया जाता है और होली के त्योहार के अवसर पर नृत्य किया जाता है। इसमें भेड़ की चमड़ी को एक बड़े गोलाकार या अष्टकोणीय लकड़ी के फ्रेम पर चिपकाया गया है, जो दाहिने कंधे पर संतुलित है।

घुंघरू: यह संगीतमय अलंकरण के लिए एक बहुत ही उल्लेखनीय वाद्य यंत्र है। उनमें से एक गुच्छा एक कपास की स्ट्रिंग में पिरोया और नर्तकियों के गोल टखनों से बंधा हुआ है, जो कलाकार के प्रत्येक चरण पर ताल से बजने वाली ध्वनियों को छेड़ते हुए नृत्य करते हैं। राजस्थान के अधिकांश शाही राजा, घुंघरू की लय के साथ नृत्य के आकर्षण का आनंद लेते थे।

मंजीरा: मंजीरा अवतल झांझ की एक जोड़ी है, जिसे पीतल, तांबा और जस्ता के मिश्रधातु में डाला जाता है और उनके केंद्र में छिद्रों से गुजरने वाली कपास की रस्सी से एक दूसरे से जुड़ा होता है। वाद्य का एक दिलचस्प उपयोग टेराटाली के कलाकारों द्वारा किया जाता है, जब तेरह झांझ का उपयोग किया जाता है।

कामायचा: इसमें एक बड़ा गोलाकार पेट चर्मपत्र, एक खूंटी प्रणाली और एक उंगली के बोर्ड से ढका है। इसमें आंत के तीन मुख्य तार होते हैं, इसके अलावा, नौ पूरक और अन्य चार सहानुभूति स्टील के तार लगाए जाते हैं, एक व्यापक पुल से गुजरते हुए। सभी तारों पर घूमते हुए घोड़े की पूंछ के बालों की लंबी लकड़ी की घुमावदार धनुष इस अद्वितीय राजस्थानी वाद्ययंत्र की विशेषता है।

बांकिया: बंकिया एक तुच्छ लूप प्रकार ट्यूब बॉडी के साथ पीतल के उपकरण की तरह एक तुरही है, जिसमें एक तश्तरी के आकार का उद्घाटन होता है और यह एक एकीकृत मुखपत्र है, जिसके माध्यम से एक हवा को शक्तिशाली रूप से उड़ाया जाता है। यद्यपि उपकरणों की संख्या के साथ खेला जाता है, यह ढोल के साथ सबसे अच्छा सुना जाता है। बंकिया बजाना एक अनूठा वाद्य यंत्र है, जिसका उपयोग आम तौर पर उत्सव के समग्र प्रभाव को मजबूत करने के लिए किया जाता है।

ढोल: ढोल एक डबल पक्षीय बैरल ड्रम है, जो ज्यादातर विवाह और त्योहारों के मौसम में खेला जाता है। शाही राजस्थान की परंपरा के अनुसार, ढोल बजाना एक महत्वपूर्ण साधन है। ढोल की रस्सी को आमतौर पर ढोल वादक की गर्दन के ऊपर रखा जाता है, जबकि ढोल की लकड़ी की बैरल की सतह को कभी-कभी उत्कीर्ण या चित्रित पैटर्न से सजाया जाता है।

नगाड़ा: नगाड़ा सबसे पुराने वाद्ययंत्रों में से एक है, जिसका उपयोग शाही समय से किया जाता है। उन समय में इसका इस्तेमाल शाही परिवारों से प्रमुख घोषणाओं और निर्णयों की घोषणा के लिए किया जाता था। यह रासमंडल और घूमर जैसे बड़े पैमाने पर सामुदायिक नृत्यों को कंपनी देने के लिए कई प्रकार के ताल, गहरी और गड़गड़ाहट पैदा करने में सक्षम है।

रावणहट्टा: इसमें झिल्ली से ढका आधा नारियल का खोल गुंजायमान होता है, जो कपास की डोरियों की सहायता से बँधा होता है, जो दो मुख्य तारों के साथ गुंजयमान यंत्र के लिए तय की गई दो फीट लंबी एक छड़ी होती है, जो घोड़े की पूंछ और स्टील की होती है। इसके अलावा सहानुभूति स्टील के तार तीन से तेरह के बीच भिन्न होते हैं, एक पुल के ऊपर से गुजरते हैं और छड़ी के किनारों पर तय लकड़ी के खूंटे से सीधे होते हैं। यह लयबद्ध झटके के साथ तारों के पार खींचे गए घोड़े की पूंछ के बालों के घुमावदार धनुष के साथ खेला जाता है, इससे जुड़ी छोटी पीतल की घंटियाँ धड़कनों पर झनझनाहट का तनाव प्रदान करती हैं।

1. माण्ड गायन शैली

10 वीं 11 वीं शताब्दी में जैसलमेर क्षेत्र माण्ड क्षेत्र कहलाता था। अतः यहां विकसित गायन शैली माण्ड गायन शैली कहलाई।

एक श्रृंगार प्रधान गायन शैली है।

प्रमुख गायिकाएं

अल्ला-जिल्हा बाई (बीकानेर) – केसरिया बालम आवो नही पधारो म्हारे देश।

गवरी देवी (पाली) भैरवी युक्त मांड गायकी में प्रसिद्ध

गवरी देवी (बीकानेर) जोधपुर निवासी सादी मांड गायिका।

मांगी बाई (उदयपुर) राजस्थान का राज्य गीत प्रथम बार गाया।

जमिला बानो (जोधपुर)

बन्नों बेगम (जयपुर) प्रसिद्ध नृतकी “गोहरजान” की पुत्री है।

2. मांगणियार गायन शैली

राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र विशेषकर जैसलमेर तथा बाड़मेर की प्रमुख जाति मांगणियार जिसका मुख्य पैसा गायन तथा वादन है।

मांगणियार जाति मूलतः सिन्ध प्रान्त की है तथा यह मुस्लिम जाति है।

प्रमुख वाद्य यंत्र कमायचा तथा खड़ताल है।

कमायचा तत् वाद्य है।

इस गायन शैली में 6 रंग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है।

प्रमुख गायक 1 सदीक खां मांगणियार (प्रसिद्ध खड़ताल वादक) 2 साकर खां मांगणियार (प्रसिद्ध कम्रायण वादक)

3. लंगा गायन शैली

लंगा जाति का निवास स्थान जैसलमेर-बाडमेर जिलों में है।

बडवणा गांव (बाड़मेर) ” लंगों का गांव” कहलाता है।

यह जाति मुख्यतः राजपूतों के यहां वंशावलियों का बखान करती है।

प्रमुख वाद्य यत्र कमायचा तथा सारंगी है।

प्रसिद्ध गायकार 1 अलाउद्दीन खां लंगा 2 करीम खां लंगा

4. तालबंधी गायन शैली

औरंगजेब के समय विस्थापित किए गए कलाकारों के द्वारा राज्य के सवाईमाधोपुर जिले में विकसित शैली है।

इस गायन शैली के अन्तर्गत प्राचीन कवियों की पदावलियों को हारमोनियम तथा तबला वाद्य यंत्रों के साथ सगत के रूप में गाया जाता है।

वर्तमान में यह पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय है।

5. हवेली संगीत गायन शैली

प्रधान केन्द्र नाथद्वारा (राजसमंद) है।

औरंगजेब के समय बंद कमरों में विकसित गायन शैली।

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