Economics GK

मुद्रा | Currency

मुद्रा (Currency)




  • मुद्रा को अंग्रेजी में monemoney कहते है जो लैटिन भाषा के शब्द Moneta से बना हिया इसे से इसका नाम धीरे-धीरे money  हो गया |
  • सर्वप्रथम मुद्रा का विकास वस्तु-मुद्रा के रूप में हुआ | वस्तु विनिमय काल में दोहरे संयोग का अभाव एक बहुत बड़ी कठिनाई थी | जिसे मुद्रा के प्रयोग ने सरल बना दिया | वस्तु विनिमय प्रणाली की जटिलता को दूर करने हेतु वर्तमान हेतु वर्तमान मुद्रा का आविष्कार हुआ | वर्तमान युग में सम्पूर्ण विनिमय मुद्रा के माध्यम से होता है |
  • वाकर- “मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करे “
  • मुद्रा विनिमय एवं भुगतान का साधन है , जो सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य होता है |
  • चलन मुद्रए में मुद्राएँ है जिन्हें सरकार चलन का अधिकार देती है | अथवा जिन्हें स्वीकार करने के लिए व्यक्ति को कानूनी तौर पर बाध्य किया जाए |
  • मुद्रा में सभी प्रकार की मुद्राएँ सम्मिलित की जाती है जबकि चलन में केवल वैधानिक मुद्राएँ ही समिलित की जाती है | सस्भी मुद्राएँ वैधानिक नहीं होती लेकिन चलन मुद्रा सदैव वैधानिक होती है |
  • चलन स्फीति – जब देश में चलन मुद्रा की मात्र बढ़ जाती है तब उत्पन्न होने वाली स्फीति चलन स्फीति कहलाती है |

मुद्रा के भेद –

  1. रजतमान – वह मौद्रिक मुद्राएँ जिसमे चांदी के सिक्के चलन में होते है | भारत में 1853 में रजतमान अपनाया गया |
  2. पत्रमान (प्रादिष्ट्मान) – वे साखमान मुद्राएँजिसके अंतर्गत कागज की मुद्रा चलती है जो की प्रधान मुद्रा होती है | यह पूर्णतया सरकार की साख पर चलती है | वर्तमान में भारत में पत्रमान मुद्राएँ प्रचलन में है |
  3. स्वर्णमान – यह मुद्रा का वह रूप है जिसमे सोने के सिक्के प्रचलन में होते है | स्वर्ण मान को स्वर्ण टंकमान, पूर्ण स्वर्ण मान , कट्टर स्वर्णमान आदि नामो से पुकारा जाता है | स्वर्ण धातुमान को सर्वप्रथम 1925 में ग्रेट ब्रिटेन ने अपनाया | भारत ने इस प्रणाली को 1927 में अपनाया |
  • मुद्रा की मांग – मुद्रा शेष की मांग प्राय: तरलता अधिमान कहलाती है |
  • मुद्रा पूर्ति – मुद्रा एक व्यष्टिभावी अवधारणा है |
  • मुद्रास्फीति – मुद्रा मूल्य में परिवर्तन की वह स्थिति मुद्रास्फीति कहलाती है जिसके अंतर्गत वस्तुओं के मूल्यों में तेजी से वृद्धि होती है तथा मुद्रा के मुल्य में तेजी से गिरावट आती है | मुद्रास्फीति मौद्रिक आय तथा वास्तविक आय में अंतर के कारण उत्पान होती है | मुद्रास्फीति की दशा में ऋणदाता को हानि होती है तथा ऋणी को लाभ होता है | मुद्रास्फीति दर थोक मूल्यों के सूचकांक के आधार पर आंकलित की जाती है रिटेल बाजार की कीमतों से नहीं | रिटेल बाजार की कीमतों का अनुमान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से लगाया जाता है | मुद्रा स्फीति के समय अधिशेष बजट अपनाना चाहिए | अर्थव्यवस्था में मंदी अथवा बेरोजगारी की समस्या के समाधान हेतु घाटे का बजट अपनाना चाहिए | राजकोषीय घाटे के कारण मुद्रा स्फीति बढती है | एवं सरकार के ऋण भार में वृद्धि होती है | सरकार आवश्यक वस्तुओं की महंगाई का हिसाब लगाने के लिए सूची तैयार करती है जिसमे महत्व के हिसाब से हर वस्तु की हिस्सेदारी होती है | सूचि में शामिल वस्तुओं का औसत मूल्य निकाला जाता है | इसी को थोक मूल्य सूचकांक कहा जाता है |

महंगाई दर के आंकड़े अब दो तरह से दिए जाते है | एक सरल मुद्रास्फीति  यानी सभी वस्तुओं की महंगाई दर जो माहवार जारी की जाती है तथा दूसरी खाद्य मुद्रास्फीति |

मासिक दर- 14 नवम्बर 2009 को मुद्रास्फीति के पहले मासिक आंकड़े अभिजीत सेन समिति की सिफ़ारिशो के आधार पर जारी किए गए |

  • मुद्रा अपस्फीति (दीफ्लेशन) – जब मुद्रा अत्यधिक बढ़ जाती है और उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर काफी नकारात्मक पड़ने लग जाता है तो सरकार द्वारा कृत्रिम तरीके से मुद्रास्फीति में कमी करने का प्रयास किया जाता है जिसे मुद्रा अपस्फीति कहा जाता है | अपस्फीति में उत्पादों (सेवाओं) के दाम गिर जाते है एवं बाजार में मांग की कमी हो जाती है | आर्थिक गतिविधियो पर विराम लग जाता है | किसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह अशुभ संकेत माना जाता है |
  • मुद्रा संकुचन – जब वस्तुओं के मूल्यों में तेजी से गिरावट आने लग जाती है तो यह स्थिति मुद्रा स्फीति कहलाती है | मुद्रा संकुचन वास्तविक आय तथा मौद्रिक आय की तुलना के कारण उत्पन्न होता है | जब मौद्रिक आय की तुलना में वास्तविक आय अधिक हो जाती है तो मुद्रा संकुचन या मुद्रा अवस्फीति उत्पन्न होती है |
  • मुद्रा संस्फिती – मुद्रा संकुचन के दुष्प्रभावो को दूर करने के लिए जान बुझकर मुद्रास्फीति की नीति अपनाई जाती है तो इसे मुद्रा संस्फिती कहा जाता है | इसके अंतर्गत कृत्रिम तरीके से मुद्रास्फीतिक दशाओं उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है | संस्फितिक दशाओं में व्यापार शेष प्रतिकूल होता है तथा आर्थिक विषमताए होती है |
  • मुद्रा अवपात – मुद्रा मूल्य में परिवर्तन की वह स्थिति जिसमे मूल्य वृद्दि के साथ साथ आर्थिक बेरोजगारी एवं निष्क्रियता की स्थिति विद्यमान रहती है |
  • लागत जन्य मुद्रास्फीति – जब उत्पाद लागत में वृद्दि के कारण मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है तो इसे लागत जन्य मुद्रास्फीति कहा जाता है |
  • मांग प्रेरित मुद्रास्फीति – यह वह अवस्था है जिसमे वर्तमान मूल्यों पर कुल मांग कुल पूर्ति से अधिक हो जाती है इस कारण कीमतें तथा मूल्य स्तर में वृद्दि होती है |
  • पूर्ण मुद्रास्फीति – पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त करने के लिए बाद जब मुद्रा की पूर्ति में वृद्दि या उपभोग एवं निवेश प्रवृति में वृद्दि के कारण मूल्यों में वृद्दि होती है तो उत्पादन एवं रोजगार नहीं बढ़ते है | कीमतें उसे अनुपात में बढती रहती है जिस अनुपात में मुद्रा बढती है इस अवस्था को वास्तविक मुद्रास्फीति भी कहा जाता है |
  • रेंगती हुई मुद्रास्फीति – जब वस्तुओ और सेवाओं की कीमतें समय के साथ-साथ धीरे-धीरे बढती है | यहाँ कीमतें बढने की औसत गति 3 प्रतिशत या इससे भी कम होती है |
  • चलती हुई मुद्रास्फीति – मुद्रास्फीति की दर जब औसतन 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत के बीच वार्षिक होती है तो इसे चलती हुई मुद्रास्फीति कहा जाता है |
  • दौड़ती हुई मुद्रास्फीति – इस प्रकार की मुद्रास्फीति उस समय उत्पन्न होती है जब कीमतें बहुत तीव्र गति से बढने लगती है | इसमें मूल्यों की वृद्दि दर 8 प्रतिशत से 11 प्रतिशत के मध्य होती है |
  • मुद्रास्फीति की गणना – भारत में मुद्रास्फीति की गणना थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर की जाती है | इसका आधार वर्ह्स बदलकर वर्ष 2011-12 कर दिया गया | भारत में मुद्रास्फीति की गणना औसत विधि बिंदु विधि दोनो विधियों के आधार पर कि जाती है | वर्तमान में मुद्रास्फीति की गणना मासिक आधार पर की जा रही है |
  • हीनार्थ प्रबन्धन – जब सरकार का बजट घाटे का होता है अर्थात आय कम होती है और व्यय अधिक होता है और वव्यय के इस आधिक्य को ऋण लेकर अथवा अतिरिक्त पत्र लेकर मुद्रा निर्गमित कर पूरा किया जाता है तो इस घाटे की वित्त व्यवस्था अथवा हीनार्थ प्रबन्धन कहा जाता है |

हीनार्थ प्रबन्धन मुद्रास्फीति दर को बढाता है |

सामान्यत: मूल्य सूचकांक के दो रूप होते है –

  1. थोक मूल्य सूचकांक (whole sale prise index-wpi)




  • साप्ताहिक आधार पर आंकलित किया जाने वाला थोक मूल्य सूचकांक भारत में शीर्षस्थ मुद्रास्फीति का लोकप्रिय पैमाना बना रहा है | यह सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में व्याप्त एक सूचकांक है जिसमे 435 वस्तुएं शामिल की गई है |
  • थोक सूचकांक में लगभग 30 वस्तुओं की आवश्यक वस्तु माना गया है |
  • नवीन ठीक मूल्य सूचकांक – खुदरा स्तर पर उपभोग के दांचे एवं मूल्य के उतार चढाव की बेहतर तस्वीर पेश करने के लिए सरकार वर्ष 2011 ने दी नये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पेश किये | इनमे एक सूचकांक ग्रामीण इलाकों में जबकि दूसरा सूचकांक शहरी इलाकों के लिए होगा इसके गणना 2004-05 आधार वर्ष पर की जाएगी और इन्हें मासिक आधार पर जारी किया जयेगा |
  1. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (consumer price index-CPI)
  • अर्थव्यवस्था की कीमतों में परिवर्तन की माप करने की दूसरी विधि cpicpi है | उपभोक्ता कीमत कको प्राय: प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जा सकता है |
  • उपभोक्ताओ के विभिन्न वर्गों के लिए निश्चित किये गये चार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (cpi) है |
  • औधोगिक कामगारों के लिए उपभोक्ता मूल्य में मुद्रास्फीति की माप उपभोक्ता मूल्य सूचकांक द्वारा की जाती है |
  • औधोगिक कामगारों क उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 2006 से शुरू किया गया |
  • औधोगिक उत्पादन सूचकांक – पूर्व में औधोगिक उत्पादन सूचकांक 1980-81 के आधार वर्ष पर आधारित है | वर्तमान में नवीन औधोगिक उत्पादन सूचकांक का आधार 1993-94 है एवं इसमें 543 वस्तुएं है | इसकी गणना माह के आखिरी शनिवार को की जाती है | 18 फरवरी 2011 को देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की नहीं श्रंखला जारी की गई हिया | इससे खुदरा बाजार में मूल्यवृद्दि से आम आदमी पर होने वाले असर को बेहतर ढंग से आँका जा सकेगा | इस नवीन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2011-12 होगा |

मुद्रा का अवमूल्यन (devaluation of money)

  • किसी अन्य मुद्रा क तुलना में जब कोई देश अपनी मुद्रा का अधिकृत मूल्य कम कर दे तो उसे अवमूल्यन कहते है |
  • अवमूल्यन से आंतरिक कीमते बढती है |
  • अभी तक भारतीय रूपये के निम्न अवमूल्यन हो चुके है |
  1. प्रथम अवमूल्यन – जून, 1949 में किया गया |
  2. द्वितीय अवमूल्यन – जून, 1966 में किया गया |
  3. तृतीय और चतुर्थ अवमूल्यन – 1 जुलाई 1991 को किया गया उस समय डा. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे |
  • 20 अगस्त 1994 से रूपये को चालु खाते में पूर्ण रूप से परिवर्तनीय मुद्रा बना दिया गया है |

विमुद्रीकरण – जब काला धन बढ़ जाता है और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है तो इसे दूर करने के लीये विमुद्रीकरण को अपनाया जाता है | इसके अंतर्गत सरकार अपनी पुरानी मुद्रा को समाप्त कर देती है और नई मुद्रा चालु कर देती है जनके पास काला धन होता है वे उसके बदले नई मुद्रा लेने का साहस नहीं जूटा पाते और काला धन स्वयं ही नष्ट हो जाता है |

मुद्रा का वर्गीकरण (classification of money)

  • धातु मुद्रा (metallic money) – धातु से बनी मुद्रा कको धातु मुद्रा कहा जाता है |
  • मानक/पूर्ण मूल्य मुद्रा – यह वह मुद्रा है जिसका मूल्य वस्तु के रूप में गैर-अमौद्रिक उद्देश्यों के लिए भी उतना ही जितना की मुद्रा के रूप में उसका मूल्य है | इस तरह की मुद्रा सिक्को के रूप में जिसका अंकित मूल्य उसके यथार्थ मूल्य अथवा धातु मूल्य के बराबर होता है | मानक मुद्रा एक एसी असीमित मुद्रा है जिसमे कितनी भी राशि का भुगतान किया जा सकता है |
  • प्रतीक मुद्रा (Tokn money) – प्रतीक मुद्रा वह प्रतिनिधि मुद्रा है जिसका यथार्थ मूल्य उसके अंकित मूल्य से कम होता है |
  • सहायक मुद्रा – सहायक मुद्रा का काम प्रतीक मुद्रा की सहायता करना है |
  • कागज़ मुद्रा –कागज-मुद्रा से तात्पर्य कागज के बने विभिन्न अंकित मूल्य के नोटो से है जिसे देश का केंद्रीय बैंक तथा सरकार जारी करती है |
  1. प्रतिनिधि कागज मुद्रा – प्रतिनिधि कागज़ मुद्रा ‘वास्तव में पूर्ण-मूल्य सिक्को अथवा उसके बराबर की स्वर्ण-बुलियन की माल गोदाम की रसीद है जो प्रचलन में होती है |’ इसे प्रतिनिधि मुद्रा पूर्ण-मूल्य मुद्रा भी कहते है |
  2. परिवर्तनीय कागज़ मुद्रा – यह वह मुद्रा है जिसे मानक सिक्को अथवा बुलियन के रूप में शत प्रतिशत समर्थन प्राप्त नहीं होता परन्तु कागज मुद्रा का धारक उसे मांग पर बुलियन अथवा सिक्को में बदलवा सकता है |
  3. अपरिवर्तनीय कागज मुद्रा – जिस कागज मुद्रा को मानक सिक्को अथवा बुलियन का कोई समर्थन नहीं होता और जिससे उनमे परिवर्तन भी नहीं हो सकता है | उसे अपरिवर्तनीय कागज मुद्रा कहते है | देशो के केंद्रीय बैंको द्वारा जारी किये गये नोट अपरिवर्तनीय कागज मुद्रा होती है | इसे प्रत्य्यी मुद्रा भी कहते है |
  4. आदेश या अधिदीष्ट-मुद्रा – जो कागज मुद्रा सरकार के आदेश पर प्रचलित होती है उसे आदेश मुद्रा कहते है | भारत सरकार द्वारा जारी प्रतीक सिक्के आदेश मुद्रा है |

स्वीकार्य कसौटी – स्वीकार्यता कसौटी के आधार पर को वैध मुद्रा और अवैध मुद्रा में वर्गीकृत किया जा सकता है |

  1. वैध मुद्रा – जिसे सरकार तथा जनता दोनों ही भुगतान और ऋण चुकाने से साधन के रूप में स्वीकार करते है | किसी देश की सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किये गये नोट और सिक्के उस देश में अनिवार्य वैध मुद्रा होती है | वैध मुद्रा को दो भागो में बांटा गया है –
  • सीमित वैध मुद्रा – यह वह मुद्रा है जिसमे क़ानूनी तौर पर निश्चित सीमा रक भुगतान किया जा सकता है | भारत में 1 रु. से कम मूल्य के सिक्के सिमित वैध मुद्रा है | इन सिक्को में 25 रु. तक का भुगतान किया जा सकता है |
  • असीमित वैध मुद्रा – असीमित मात्रा में कानूनी तौर पर इसमें भुगतान किया जा सकता है | भारत में सभी कागज़ एक नोट और एक, दो, पांच, रूपये के सिक्के असीमित वैध मुद्रा है |
  1. अवैध मुद्रा – जिस मुद्रा को सरकार अथवा केंद्रीय बैंक की कानूनी मंजूरी नहीं होती उसे अवैध मुद्रा कहा जाता है | चैको, हुंडियों और प्रनोटों से प्रचलित मुद्रा अवैध मुद्रा है | लोगो लो इस तरह की मुद्रा स्वीकार करने पर बाध्य नहीं किया जा सकता है |

वास्तविक मुद्रा – किसी भी देश में मुद्रा अर्थात दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली मुद्रा ही वास्तविक मुद्रा है |

लेखे की मुद्रा – हिसाबी मुद्रा वह मुद्रा है जिसमे ऋण वस्तुओं की मूल्य तथा सामान्य क्रय शक्ति व्यक्त की जाती है |